सुंदरता का मूल्य...!! एक अती सुन्दर महिला ने विमान में प्रवेश। किया और अपनी सीट की तलाश में नजरें घुमाईं। उसने देखा कि उसकी सीट एक ऐसे व्यक्ति के बगल में है। जिसके दोनों ही हाथ नहीं है। महिला को उस अपाहिज व्यक्ति के पास बैठने में झिझक हुई। उस 'सुंदर' महिला ने एयरहोस्टेस से बोली "मै इस सीट पर सुविधापूर्वक यात्रा नहीं कर पाऊँगी। क्योंकि साथ की सीट पर जो व्यक्ति बैठा हुआ है उसके दोनों हाथ नहीं हैं। उस सुन्दर महिला ने एयरहोस्टेस से सीट बदलने हेतु आग्रह किया। असहज हुई एयरहोस्टेस ने पूछा, "मैम क्या मुझे कारण बता सकती है..?" 'सुंदर' महिला ने जवाब दिया "मैं ऐसे लोगों को पसंद नहीं करती। मैं ऐसे व्यक्ति के पास बैठकर यात्रा नहीं कर पाउंगी। दिखने में पढी लिखी और विनम्र प्रतीत होने वाली महिला की यह बात सुनकर एयरहोस्टेस अचंभित हो गई। महिला ने एक बार फिर एयरहोस्टेस से जोर देकर कहा कि "मैं उस सीट पर नहीं बैठ सकती। अतः मु...
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प्रिय माता-पिता एवम अभिभावक
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प्रिय माता-पिता एवम अभिभावक 15 मिनिट का समय निकालिये और अपने बच्चों को इन लिखी बातें को पढ़कर सुनाइए। क्या पता ये बातें उनका जीवन बदल दे। ये बातें जो विद्यार्थियों को नहीं सिखाई जाती ??? रतन टाटा की सीख :--- रतन टाटा ने एक स्कूल में भाषण के दौरान 10 बातें बताई, जो विद्यार्थियों को नहीं सिखाई जाती. 1 जीवन उतार-चढ़ाव से भरा है इसकी आदत बना लो 2) लोग तुम्हारे स्वाभिमान की परवाह नहीं करते इसलिए पहले खुद को साबित करके दिखाओ. 3) कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद 5 आंकड़े बाली पगार की मत सोचो, एक रात में कोई वाइस प्रेसिडेंट नहीं बनता. इसके लिए अपार मेहनत करनी पड़ती है. 4) अभी आपको अपने शिक्षक सख्त और डरावने लगते होंगे क्योंकि अभी तक आपके जीवन में बॉस नामक प्राणी से पाला नहीं पड़ा. 5) तुम्हारी गलती सिर्फ तुम्हारी है, तुम्हारी पराजय सिर्फ तुम्हारी है. किसी को दोष मत दो, गलती से सीखो और आगे बढ़ो. 6) तुम्हारे माता पिता तुम्हारे जन्म से पहले इतने नीरस और ऊबाऊ नहीं थे जितना तुम्हें अभी लग रहा है. तुम्हारे पालन पोषण करने में उन्होंने इइतना कष्ट उठाया कि उनका स्वभाव बदल गया. 7) सांत्वना पुरस्कार सिर्फ...
गरीब आदिवासी परिवार की बेटी बनी अधिकारी
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गरीब आदिवासी परिवार की बेटी बनी अधिकारी कुमारी प्रियंका कश्यप का भूवैज्ञानिक अधिकारी के पद पर हुआ चयन। UPSC के माध्यम से होने वाली G.S.I (जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया) की परीक्षा को अपने पहले प्रयास में ही पास करके बनी अपने परिवार, गांव और अपने आदिवासी समाज का गौरव। कुमारी प्रियंका कश्यप ग्राम पंचायत बिरिंगपाल, कुच्चा पारा,पोस्ट-पंडरीपानी,तहसील-जगदलपुर,जिला-बस्तर,छत्तीसगढ में रहने वाले आदिवासी माड़िया जनजाति के घासी कश्यप और श्रीमती लक्ष्मी कश्यप की सुपुत्री है। प्रियंका शुरू से होनहार स्टूडेंट रही है। कक्षा आठवीं तक ममता विद्यालय भड़िसगांव से पढ़कर निकली प्रियंका ने आगे की पढ़ाई शासकीय हायर सेकेंडरी विद्यालय पंडरीपानी से किया और दसवीं बोर्ड में 70% और बारहवीं बोर्ड की परीक्षा 74% से उत्तीर्ण किया। प्रियंका ने काॅलेज में भी अपनी योग्यता को जारी रखते हुए बी.एस.सी में 64% और एम.एस.सी में 79% मार्क्स लाए। फिर प्रियंका ने कोई भी महंगी कोचिंग क्लास न ज्वाइन करते हुए अपने घर में रहकर ही UPSC की तैयारी करती रही। गरीबी में रहकर भी कैसे बड़ी उपलब्धी हासिल की जा सकती है, इसके लिए प्रियंका सभी ...
‘पार्कर सोलर प्रोब’
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‘पार्कर सोलर प्रोब’ नासा के अंतरिक्ष यान ‘पार्कर सोलर प्रोब’ ने सूर्य के अब तक के सबसे निकटतम बिंदु पर पहुंचकर इतिहास रच दिया है। एक छोटी कार के आकार का पार्कर क्रिसमस की पूर्व संध्या पर कोरोना (सूर्य का सबसे बाहरी आवरण) के प्रचंड ताप का सामना करते हुए सूरज की सतह से महज 61 लाख किमी की दूरी से गुजरा। पार्कर इतिहास का सबसे तेज रफ्तार से उड़ने वाला अंतरिक्ष यान है। जिस समय पार्कर सूरज के नजदीक से गुजर रहा था, तब इसकी रफ्तार 6.90 लाख किमी प्रति घंटा थी। ये रफ्तार इतनी ज्यादा है कि इससे टोक्यो से वाशिंगटन डीसी की यात्रा एक मिनट से भी कम समय में पूरी हो जाए! पार्कर का मुख्य उद्देश्य सूर्य और पृथ्वी के बीच के संबंधों को समझना है। यह यान विशेष रूप से सूर्य के उन पहलुओं का अध्ययन कर रहा है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी वासियों के जीवन पर प्रभाव डालते हैं। साथ ही, यह सूर्य पर निरंतर निगरानी रखकर इसके कई रहस्यों को सुलझाने में विज्ञानियों की मदद भी कर रहा है। मोटे तौर पर इस मिशन का लक्ष्य सूर्य के कोरोना का अवलोकन करना है, ताकि सूर्य के विभिन्न कारकों जैसे सौर तूफान, सूर...
बेटियां सौभाग्य से मिलती hain
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बेटियां सौभाग्य से मिलती हैं अपनी प्लेट में दो तरह की आइसक्रीम का मज़ा लेती सुनीता ने अपने देवर विनोद को कहा, "क्या देवर जी तीसरी बेटी होने पे कौन पार्टी देता है? अब तो दहेज़ के पैसे जुटाना शुरू कर दो।" अपनी भाभी के प्लेट को देख हँसते हुए विनोद ने कहा, अरे भाभी ! "आप क्यूँ चिंता करती है घर में ख़ुशी आयी थी तो सबके साथ बाँट लिया और फिर बेटियां तो अपना भाग्य ले कर आती है।" अपने देवर की बात सुन सुनीता मुस्कुरा के रह गई...जबकि असल में दिल खुशी से झूम रहा था देवर के घर तीसरी बेटी का जन्म जो हुआ था। खुद सुनीता के दो बेटे थे और इस बात का खूब घमंड रखती। दो तीन दिन में सारे मेहमान चले गए। अब घर पे थे तो विनोद रूचि और तीनों बेटियां मानवी, अंकिता और तीसरी बेटी जिसका नाम सबने प्रीति रखा। समय अपनी रफ़्तार से चल रहा था बच्चियों एक से बढ़ कर एक थी चाहे पढ़ाई हो या घर में माँ की मदद करना। घर की दीवारें बेटियों की बनायीं खूबसूरत पेंटिंग से सजती और अलमारियां उनके जीते मैडल और ट्रॉफी से, तीनों बेटियों की किलकारी और हँसी से विनोद और रूचि का घर गुलजार रहता। सुनीता कोई मौका नहीं छोड़ती रूचि को...
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नाराज़ होने से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है किसी रिश्ते से निराश हो जाना ... नाराज़ होने में ही छुपा है कि नाराज़ होने वाले का, नाराज़ होने वाले से अभी भी कुछ वास्ता है, निराश हो जाना रिश्ते से अलग होने का, पहला क़दम, पहला रास्ता है, नाराज़गी देती है रास्ता रिश्तों को रफ़ू करने का, निराशा करती है निर्णय रास्ता बदलने का 🖤 नाराज़गी, तेज़ आँच पर चढ़ा उफ़नता दूध है, जो पल भर में बर्तन से बाहर, मगर अगले ही पल मनुहार का पानी पाकर बर्तन की तली में होता है, मगर उबलते हुए या तली से मिलते हुए जो अपना असल रूप नहीं खोता है रिश्ते की निराशा, धीमी आँच पर उबलता दूध है, जो आहिस्ता आहिस्ता, ख़ामोशी से बर्तन के अंदर मचलता है, कई दफ़ा अपने मन की कहने को ढक्कन की तरफ़ भी चलता है, मगर उसकी जलन जब सुनी नहीं जाती और हारने लगती हैं कोशिशें उसकी, तो ख़ुद को स्वाहा कर लेता है वो, बर्तन, चूल्हे, ढकने से निराश होकर ख़ुद का चेहरा बदल लेता है वो, और फिर कभी दूध के रूप में वापस नहीं लौटता।🖤 इसलिए नाराज़ होने से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक है किसी रिश्ते से निराश हो जाना
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एक अखबार वाला प्रात:काल लगभग 5 बजे जिस समय वह अख़बार देने आता था, उस समय मैं उसको अपने मकान की 'गैलरी' में टहलता हुआ मिल जाता था। अत: वह मेरे आवास के मुख्य द्वार के सामने चलती साइकिल से निकलते हुए मेरे आवास में अख़बार फेंकता और मुझको 'नमस्ते डॉक्टर साब' वाक्य से अभिवादन करता हुआ फर्राटे से आगे बढ़ जाता था। क्रमश: समय बीतने के साथ मेरे सोकर उठने का समय बदल कर प्रात: 7:00 बजे हो गया। जब कई दिनों तक मैं उसको प्रात: नहीं दिखा तो एक रविवार को प्रात: लगभग 9:00 बजे वह मेरा कुशल-क्षेम लेने मेरे आवास पर आ गया। जब उसको ज्ञात हुआ कि घर में सब कुशल- मंगल है, मैं बस यूँ ही देर से उठने लगा था। वह बड़े सविनय भाव से हाथ जोड़ कर बोला, "डॉक्टर साब! एक बात कहूँ?" मैंने कहा... "बोलो" वह बोला... "आप सुबह तड़के सोकर जगने की अपनी इतनी अच्छी आदत को क्यों बदल रहे हैं? आप के लिए ही मैं सुबह तड़के विधान सभा मार्ग से अख़बार उठा कर और फिर बहुत तेज़ी से साइकिल चला कर आप तक अपना पहला अख़बार देने आता हूँ...सोचता हूँ कि आप प्रतीक्षा कर रहे होंगे।" मैने विस्मय से पूछा.....