क्यों पढ़ें

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“गुरुजी, मैंने बहुत सारी किताबें पढ़ी हैं... लेकिन ज़्यादातर मैं भूल गया हूँ। तो फिर पढ़ने का क्या मतलब है?”


यह एक जिज्ञासु छात्र का अपने गुरु से सवाल था। गुरु ने कोई जवाब नहीं दिया। वह बस चुपचाप उन्हें देखते रहे।


कुछ दिनों बाद, वे नदी के किनारे बैठे थे, अचानक, गुरुजी कहा:

“मुझे प्यास लगी है। मेरे लिए थोड़ा पानी लाओ... लेकिन ज़मीन पर पड़ी उस पुरानी छलनी से पानी लाओ।”


छात्र उलझन में लग रहा था। यह एक बेतुका अनुरोध था। कोई छेदों वाली छलनी में पानी कैसे ला सकता है?


लेकिन उसने बहस करने की हिम्मत नहीं की।


उसने छलनी उठाई और कोशिश की।

एक बार। दो बार। बार-बार...


उसने अलग-अलग कोण पर छलनी को घुमाया, यहाँ तक कि अपनी उंगलियों से छेदों को ढकने की भी कोशिश की। कुछ भी काम नहीं आया। वह एक बूँद भी नहीं रोक सका।


थका हुआ और निराश होकर, उसने छलनी शिक्षक के पैरों पर गिरा दी और कहा:

“मुझे माफ़ करना। मैं फेल हो गया। यह नामुमकिन था।”


शिक्षक ने उसे प्यार से देखा और कहा:

“तुम फेल नहीं हुए। छलनी तो देखो।”


छात्र ने नीचे देखा... और कुछ देखा।

पुरानी, काली, गंदी छलनी अब साफ़ चमक रही थी। पानी, हालाँकि पानी कभी रुकता नहीं था, लेकिन छलनी को बार-बार धोता रहा था। छलनी चमकने लगा था।


शिक्षक ने आगे कहा:

“पढ़ने का यही मतलब है। अगर आपको हर छोटी-बड़ी बात याद न हो, तो कोई बात नहीं। अगर ज्ञान छलनी से पानी की तरह फिसलता हुआ प्रतीत हो, तो भी कोई बात नहीं...


क्योंकि जब आप पढ़ते हैं, तो आपका मन तरोताज़ा होता है।

आपकी चेतना का नवीनीकरण होता है।

आपके विचारों में ऑक्सीजन भर जाती है।

और भले ही आपको तुरंत इसका एहसास न हो, आप अंदर से बाहर तक बदल रहे होते हैं।”


पढ़ने का असली उद्देश्य यही है।

अपनी याददाश्त भरने के लिए नहीं...

बल्कि अपनी चेतना को शुद्ध और समृद्ध करने के लिए।

*- Er.Gajendra Sahu Ji-*

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