*लिंगो संग बानी बिरादरी*

 *लिंगो संग बानी बिरादरी* 


चलो जतरा चैत पुन्नी के,
  लिंगो जी ने बुलाया है।
अठारह बाजा, अठारह डाका,
  बानी बिरादरी से सजाया है।
प्राचीन जीवन-दर्शन की नींव रख,
  अस्तित्व की राह दिखाया है।
गुरु की पदवी पर विराजे जो,
  आराध्य पेनों को मार्ग बताया है।
वल्लेकनार्र, अंतागढ़ से नेवता,
  बानी बिरादरी को बुलाया है।
चलो जतरा चैत पुन्नी के,
  लिंगो जी ने बुलाया है।
एक बानी करे माटी सेवा,
  एक भाई जल भर लाया है।
मउर फूलों से सजा बजार,
  कलार भाई मंद लाया है।
एक चाक में बने दिया-करसा,
  कोष्ठा ने पालो भिजवाया है।
बज उठे घुँघरू और तुर्रा,
  तेली भाई तेल लाया है।
चलो जतरा चैत पुन्नी के,
  लिंगो जी ने बुलाया है।
एक बानी घर के मुर्रा लाई,
  पारधी ने चाउर पिसाया है।
सोना-चाँदी के सजे आभूषण,
  एक भाई प्रहरी को औजार दिलाया है।
साज सजे मंडा चारों ओर,
  मूर्र ने जीवा में बसाया है।
गाड़ा के बाजा डम-डम बाजे,
  लिंगो ने कोया बुम जगाया है।
चलो जतरा चैत पुन्नी के,
  लिंगो जी ने बुलाया है।

 ✍️धर्मपाल कोड़ापे

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