आदिवासी संस्कृति का संरक्षण
*🙏सच कड़वा लगता है, लेकिन सच को स्वीकार करना ही समझदारी है। यह बात हम सब पर लागू होती है। 🙏*
*👉 हमारे समाज के लिए जो निर्णय अदालत से आया है, वह हमें आईना दिखाने वाला है। यदि कोई आदिवासी होकर भी अपने समाज की रीति-रिवाज और परंपराओं को छोड़कर हिन्दू परंपराओं के अनुसार जीवन जीता है, तो उस पर उसी कानून की प्रक्रिया लागू होगी। इसमें अदालत से ज्यादा कहीं न कहीं हम पढ़े-लिखे लोग ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि बदलाव का बीज हमने ही बोया है।*
*👉यदि हम चाहते हैं कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारी परंपराएं सुरक्षित रहें, तो केवल बातें करने से नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में जीने से बचाया जा सकता है।*
*👉 अगर परंपरा बचानी है, तो विवाह संस्कार में शुरू से लेकर अंत तक शामिल होना होगा। आजकल हम केवल दावत के दिन पहुंचते हैं, जो हमारी परंपरा के साथ न्याय नहीं है।*
*👉 अगर परंपरा बचानी है, तो जन्म संस्कार में भी सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। केवल औपचारिकता निभाने से परंपराएं जीवित नहीं रहतीं।*
*👉 अगर परंपरा बचानी है, तो मृत्यु संस्कार में भी पूरी संवेदना और जिम्मेदारी के साथ शामिल होना होगा। यह भी हमारे जीवन-दर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।*
*👉 अगर परंपरा बचानी है, तो पेन कड़साड़ में भी उपस्थित रहना होगा, क्योंकि यही हमारी आस्था और पहचान का आधार है।*
*👉 अगर परंपरा बचानी है, तो पेन मांडेय (मड़ई) में भी सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। आज हम ही वहाँ जाना छोड़ते जा रहे हैं, जबकि यही हमारे समाज की पहचान है।*
*👉आज हम पढ़-लिखकर अपने आपको बहुत समझदार मानने लगे हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि हम शहरी और ग्रामीण समाज के बीच संतुलन नहीं बना पा रहे हैं। अक्सर शहर में रहने वाले लोग खुद को अधिक जागरूक समझते हैं, जबकि गांव के लोग आज भी हमारी परंपराओं को सहेजकर रखे हुए हैं।*
*इसलिए समय रहते गांव वालों से सीखिए, अपनी जड़ों से जुड़िए और अपनी संस्कृति को बचाइए। क्योंकि अगर हमारी पहचान और परंपरा ही नहीं बचेगी, तो जिंदगी भर की कमाई हुई दौलत भी किसी काम नहीं आएगी।*
*🙏अपनी संस्कृति बचाइए — अपनी पहचान बचाइए। यही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।🙏*
✍️ बस्तरिया वट्टी दादी🙏
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें