*पुरखों की विरासत बनाम बाहरी हस्तक्षेप*

 *पुरखों की विरासत बनाम बाहरी हस्तक्षेप* 


हमारी संस्कृति, बोली-भाषा, परब-पंडुम, पहनावा एवं रूढ़ि-नेंग ही हमारी वास्तविक पहचान हैं। कोया जब गर्भ में होता है, तभी से उसे प्रकृति की रक्षा और प्राकृतिक शिक्षा का ज्ञान मिलने लगता है। आज बुजुर्गों से दूरी के कारण युवा अवश्य भटक रहे हैं, किंतु उनकी अस्मिता उनके अनादिकालीन परंपरा और संस्कृति में ही निहित है।
हमारे पूर्वजों ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा तथा अपनी संस्कृति में बाह्य हस्तक्षेप के विरुद्ध संघर्ष किया है, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं; जैसे — संथाल विद्रोह (1855-56), मुंडा उलगुलान (1899-1900), हल्बा डोंगर आंदोलन (1774-1779), कोया विद्रोह, भील और कोल आंदोलन। यदि इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि को खंगाला जाए, तो स्पष्ट होगा कि हमारे पूर्वज सदैव बाहरी हस्तक्षेप के विरोध में खड़े रहे।
हमारे पुरखों को भली-भांति ज्ञात था कि हमारी संस्कृति, परब-पंडुम एवं नेंग-जोग में हस्तक्षेप कर हमें अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया जाएगा। उन्हें यह भी स्पष्ट था कि हमारी परंपराओं को अपने ग्रंथों के समान बताकर मितव्यवहार के माध्यम से हमारे निकट आया जाएगा, फिर धीरे-धीरे विश्वास जीतकर हमारी व्यवस्था, हमारी पहचान और हमारे अधिकारों पर कब्जा किया जाएगा। हमारे भाव-सेवा को बलि कहकर वही लोग रोज़ मुर्गा-बकरा की दावत उड़ाएँगे और अंततः हमारी स्वसत्ता को छीनने की दूरगामी चाल चलेंगे। आज मूलबीजों ने उन्हीं का अनुसरण कर स्वयं अपनी कब्र खोदने का कार्य किया है।
दूसरी ओर, कुछ लोग ग्रामीण सोच, पुरखों की जीवन-पद्धति, रहन-सहन, रीति-नीति, नेंग-जोग एवं मान्यताओं से दूरी बनाकर स्वयं को आधुनिक सिद्ध करने का ढोंग रचते हैं। मैं आपके आधुनिक विचारों का सम्मान करता हूँ, किंतु क्या विशेष अवसरों पर आप अपने वजूद और अपने पुरखों की तरह नहीं रह सकते? मैं फैशन की बात नहीं कर रहा, बल्कि यह पूछ रहा हूँ कि क्या आपकी आधुनिकता और आपकी जड़ें साथ-साथ नहीं चल सकतीं?
मुझे गर्व है अपने पुरखों पर, अपनी संस्कृति पर, अपनी माटी पर और उनके जैसा होने पर। मैं वर्तमान पीढ़ी का हूँ, थोड़ा आधुनिक भी हूँ, किंतु उससे कहीं अधिक अपने पुरखों-सा हूँ।


> ✍🏻 धर्मपाल कोड़ापे

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