आजादी के 80 दशक
आजादी के 80 दशक बाद भी आदिवासी गुलाम है न उनकी भाषा बची,न जमीन बचा ,न संस्कृति बची ,न देव बचा ,न देवालय ,शिक्षा बची,न पुरखों का इतिहास बचा बचा है तो लाचारी जिनको न सत्ता सुनती है न ही सरकार,न प्रशासन न पुलिस हर तरफ से आदिवासी हाशिए पर है जहां सिर्फ कटना उनको है ..
आखिर 80 दशक बाद इतने संविधान में अधिकार है फिर लाचारी वो जमीन पर कही नहीं बचा आज आदिवासियों के नाम पर भारत में सबसे ज्यादा संगठन पर सभी सूटकेश के लिए और आरक्षित नेता कुत्ता से बत्तर हो गया है न बोलता है न सुनता है मै कैसे आजादी मनाऊं जब मेरे समाज को नक्सली देशद्रोही विकास बाधक इस देश की सत्ता कहती है मै युवा पीढ़ी से अनुरोध करता हु जागो और भावनात्मक राजनीति समाज नीति से बाहर आओ समाज को इस दलदल से निकालना आपकी जिम्मेदारी है..
आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर आदिवासी समाज का सबसे बड़ा सवाल: आखिर यह कैसी आज़ादी है?
“आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी अगर किसी समाज को अपनी जमीन, जंगल, भाषा, संस्कृति, देवस्थल, शिक्षा, सम्मान और अपने भविष्य के लिए लगातार लड़ना पड़े, तो सवाल सिर्फ उस समाज से नहीं—पूरी व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।”
15 अगस्त 2026।
देश तिरंगे के नीचे खड़ा होगा।
स्कूलों में राष्ट्रगान होगा।
हर तरफ देशभक्ति के गीत बजेंगे।
बच्चे हाथों में तिरंगा लेकर “भारत माता की जय” कहेंगे।
नेता आजादी के संघर्ष, संविधान और लोकतंत्र की उपलब्धियां गिनाएंगे।
लेकिन उसी भारत के किसी दूरस्थ आदिवासी गांव में एक बच्चा शायद आज भी ऐसी भाषा में पढ़ रहा होगा जिसे वह पूरी तरह समझता तक नहीं।
किसी गांव में पीने के पानी के लिए कई किलोमीटर चलना होगा।
किसी परिवार के सामने यह डर होगा कि जिस जमीन पर उसके पुरखे पीढ़ियों से खेती करते आए हैं, उसका कागज किसके नाम है।
किसी बुजुर्ग के पास अपने पुरखों की ऐसी स्मृतियां होंगी जिन्हें लिखने वाला कोई नहीं।
किसी पहाड़ी पर वह देवस्थान होगा जिसका सरकारी नक्शे में शायद कोई अस्तित्व नहीं।
किसी जंगल में वह पेड़ होगा जिसके नीचे समुदाय की आस्था, इतिहास और सामूहिक स्मृति जुड़ी होगी—लेकिन विकास की किसी फाइल में वह सिर्फ “संसाधन” बन जाएगा।
और तब मन पूछता है—
मैं आजादी कैसे मनाऊं?
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यह सवाल भारत के खिलाफ नहीं, भारत को उसके संविधान का आईना दिखाने वाला सवाल है
सबसे पहले एक बात साफ होनी चाहिए।
आदिवासी अधिकारों की बात करना भारत-विरोध नहीं है।
जल-जंगल-जमीन की बात करना विकास-विरोध नहीं है।
अपनी भाषा और संस्कृति बचाने की मांग करना अलगाववाद नहीं है।
ग्रामसभा के अधिकार की बात करना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है।
बल्कि ये सब उस संविधान की आत्मा से जुड़े प्रश्न हैं, जिसने भारत के सबसे कमजोर और ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों के लिए विशेष सुरक्षा की व्यवस्था की।
संविधान की पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन के लिए विशेष व्यवस्था करती है। सरकार स्वयं मानती है कि अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय आबादी की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर संवैधानिक संरक्षण आवश्यक है।
फिर सवाल यह है—
अगर संविधान ने अधिकार दिए हैं, तो वे अधिकार जमीन पर कितने दिखाई देते हैं?
यही असली सवाल है।
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कागज पर अधिकार और जमीन पर लाचारी के बीच इतनी बड़ी दूरी क्यों है?
आदिवासी समाज के लिए भारत में केवल संविधान ही नहीं, बल्कि कई महत्वपूर्ण कानून बनाए गए।
पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 यानी PESA ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को महत्वपूर्ण भूमिका दी।
वन अधिकार अधिनियम, 2006 का उद्देश्य ही ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना, वन-आश्रित आदिवासियों की भूमि, आजीविका और सामुदायिक वन अधिकारों को मान्यता देना था। सरकार के अनुसार ग्रामसभा को वन संसाधनों के संरक्षण और स्थानीय निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है।
लेकिन 2025 में संसद की एक समिति ने भूमि अधिग्रहण की व्यवस्था की समीक्षा करते हुए यह चिंता दर्ज की कि कई मामलों में ग्रामसभा की सहमति केवल औपचारिकता बन जाती है और आदिवासी क्षेत्रों में जमीन तथा आजीविका के मूल्यांकन से जुड़ी गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं।
यानी समस्या सिर्फ कानून की कमी नहीं है।
समस्या कानून और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच की खाई भी है।
और यही खाई आदिवासी समाज की सबसे बड़ी पीड़ा है।
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जल-जंगल-जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं, आदिवासी जीवन की पूरी सभ्यता है
शहर के लिए जमीन का अर्थ हो सकता है—एक प्लॉट।
किसी कंपनी के लिए जमीन का अर्थ हो सकता है—खनिज, उद्योग या परियोजना।
सरकारी फाइल में जमीन का अर्थ हो सकता है—राजस्व रिकॉर्ड का एक खसरा नंबर।
लेकिन आदिवासी समाज के लिए जमीन केवल जमीन नहीं होती।
वह पुरखा है।
वह पहचान है।
वह रोजगार है।
वह अन्न है।
वह देव है।
वह स्मृति है।
वह सामुदायिक जीवन की नींव है।
इसीलिए जमीन छिनने का अर्थ केवल आर्थिक नुकसान नहीं है।
कई बार इसका अर्थ होता है—
एक पूरी जीवन-पद्धति का विस्थापन।
भारत सरकार के पुराने आधिकारिक दस्तावेजों में भी यह दर्ज किया गया है कि प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और विकास परियोजनाओं का आदिवासी समुदायों पर असमान रूप से बड़ा प्रभाव पड़ा है। एक सरकारी संकलन में बारहवीं पंचवर्षीय योजना के हवाले से बताया गया था कि 1951 से 1990 के बीच परियोजनाओं के कारण विस्थापित लोगों में आदिवासियों का अनुपात अत्यधिक था और पुनर्वास की स्थिति भी चिंताजनक रही।
वर्जिनियस ज़ाक्सा की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने भी आदिवासी भूमि-विमुखता, विस्थापन और सामुदायिक संसाधनों के नुकसान को गंभीर संरचनात्मक समस्या के रूप में दर्ज किया था।
तो फिर आज भी यह सवाल पूछना क्यों गलत माना जाए?
विकास किसके लिए है?
विकास की कीमत कौन चुका रहा है?
जिसकी जमीन पर परियोजना बन रही है, उसकी आवाज उस परियोजना में कितनी है?
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वन अधिकार कानून बना—फिर भी अधिकार पाने के लिए इतना संघर्ष क्यों?
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य भी सामने रखना जरूरी है।
यह कहना भी सही नहीं होगा कि आज तक कोई अधिकार मिला ही नहीं।
सरकार के मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार 2021 से जनवरी 2026 के बीच वन अधिकार अधिनियम के तहत 5,45,802 शीर्षक वितरित किए गए और 2023 से जनवरी 2026 के बीच लगभग 69.19 लाख एकड़ वन भूमि के वितरण की सूचना दी गई।
दिसंबर 2025 तक उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में कुल 44,33,940 वन अधिकार दावों का निपटारा होने की जानकारी दी गई थी।
इसका अर्थ यह है कि परिवर्तन हुए हैं।
लेकिन दूसरा सवाल और ज्यादा महत्वपूर्ण है—
क्या हर पात्र परिवार तक अधिकार पहुंचा?
क्या हर ग्रामसभा सक्षम हुई?
क्या हर सामुदायिक वन अधिकार वास्तव में मजबूत हुआ?
क्या हर गांव में आदिवासी अपने अधिकारों को जानता है?
क्या अधिकारी और स्थानीय संस्थाएं कानून की भावना के अनुसार काम करती हैं?
यहीं असली परीक्षा शुरू होती है।
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भाषा चली गई तो केवल शब्द नहीं जाएंगे—एक पूरा संसार चला जाएगा
आपने लिखा—
“न उनकी भाषा बची…”
इस वाक्य को थोड़ा और गहराई से समझने की जरूरत है।
भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं है।
भाषा में किसी समाज की—
- स्मृति,
- लोककथा,
- गीत,
- कृषि ज्ञान,
- जंगल का ज्ञान,
- औषधीय ज्ञान,
- रिश्तों की संरचना,
- देव-परंपरा,
- इतिहास,
- हास्य,
- दुख,
- दर्शन
सब कुछ छिपा होता है।
UNESCO की 2025 की रिपोर्ट में भारत की भाषाई स्थिति पर चिंता जताई गई है और बताया गया है कि भारत की लगभग 200 भाषाओं को UNESCO के पुराने Atlas में vulnerable या endangered श्रेणियों में दर्ज किया गया था; छोटी आदिवासी और स्वदेशी भाषाएं संस्थागत समर्थन, शिक्षा, मीडिया और डिजिटल उपस्थिति की कमी के कारण अधिक जोखिम में रहती हैं।
भारत सरकार भी स्वयं आदिवासी भाषाओं में शिक्षा-सामग्री और पुस्तकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता स्वीकार करती है। शिक्षा मंत्रालय की सामग्री में बहुभाषी शिक्षा, मातृभाषा में शुरुआती शिक्षा और स्थानीय भाषाओं में शिक्षण-सामग्री पर जोर दिया गया है।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि आदिवासी बच्चा हिंदी या अंग्रेजी क्यों सीखे।
उसे जरूर सीखना चाहिए।
लेकिन सवाल है—
क्या उसे अपनी मां की भाषा भूलकर ही आधुनिक बनना पड़ेगा?
अगर एक बच्चा अंग्रेजी सीखता है और अपनी मातृभाषा भी बचाए रखता है, तो वह दो दुनियाओं का नागरिक बनता है।
लेकिन अगर विकास के नाम पर उसकी मातृभाषा को हीन बना दिया गया, तो उससे केवल भाषा नहीं छीनी जाती—
उसकी आत्मविश्वास की जड़ भी कमजोर होती है।
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शिक्षा चाहिए, लेकिन ऐसी शिक्षा जो बच्चे को अपने समाज से ही नफरत न सिखाए
शिक्षा का अर्थ केवल किताब पढ़ना नहीं है।
अगर बच्चे को यह सिखाया जाए कि उसका गांव पिछड़ा है, उसकी भाषा पिछड़ी है, उसके बुजुर्ग अनपढ़ हैं, उसकी परंपराएं अंधविश्वास हैं और उसकी संस्कृति आधुनिकता के रास्ते की बाधा है—
तो ऐसी शिक्षा उसके भीतर आत्मविश्वास पैदा नहीं करेगी।
वह उसे अपनी जड़ों से काट देगी।
2011 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजातियों की साक्षरता दर 59 प्रतिशत थी, जबकि कुल आबादी की साक्षरता लगभग 73 प्रतिशत थी। छत्तीसगढ़ में ST साक्षरता 59.1 प्रतिशत थी।
बाद के सर्वेक्षणों में सुधार हुआ है। सरकार ने PLFS 2019-20 के आधार पर ST साक्षरता 70.1 प्रतिशत तक पहुंचने की सूचना दी थी।
इस सुधार का स्वागत होना चाहिए।
लेकिन शिक्षा की अगली लड़ाई सिर्फ साक्षरता प्रतिशत की नहीं है।
अब सवाल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मातृभाषा, शिक्षक, उच्च शिक्षा, रोजगार और ज्ञान पर अधिकार का है।
क्योंकि गरीब आदिवासी बच्चे को सिर्फ स्कूल में दाखिला नहीं चाहिए।
उसे ऐसी शिक्षा चाहिए जिससे वह—
कानून पढ़ सके।
संविधान समझ सके।
अपनी जमीन का रिकॉर्ड पढ़ सके।
ग्रामसभा की शक्ति समझ सके।
बजट समझ सके।
खनन कंपनी का दस्तावेज पढ़ सके।
अपने अधिकार के लिए अदालत में सवाल पूछ सके।
और सबसे जरूरी—
अपने समाज को पिछड़ा समझने की मानसिक गुलामी से बाहर निकल सके।
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वीडियो में दिखती गरीबी को सिर्फ “नक्सल क्षेत्र” कहकर मत समझिए
आपके भेजे पहले वीडियो में जिन दृश्यों का इस्तेमाल किया गया है, उनमें दूरस्थ इलाकों की बुनियादी सुविधाओं, पानी और सामाजिक समस्याओं की तस्वीर दिखाई गई है।
दूसरे वीडियो में कठिन मजदूरी, गरीबी और संसाधनों पर अधिकार के सवाल को उभारा गया है।
इन वीडियो के हर दावे को स्वतंत्र सरकारी आंकड़ा मान लेना उचित नहीं होगा, लेकिन उनके दृश्य एक बड़े वास्तविक प्रश्न की ओर जरूर संकेत करते हैं—
क्यों भारत के संसाधन-संपन्न और वन-बहुल क्षेत्रों में रहने वाले अनेक समुदायों को आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है?
यहां एक और ईमानदार बात जरूरी है।
नक्सलवाद की हिंसा को सही नहीं ठहराया जा सकता।
CPI (Maoist) की हिंसक राजनीति ने स्वयं आदिवासी समुदायों को भारी नुकसान पहुंचाया है। गृह मंत्रालय के अनुसार 2004 से नवंबर 2025 तक LWE हिंसा में हजारों लोग मारे गए और मृत नागरिकों में बड़ी संख्या आदिवासियों की रही।
लेकिन यही तथ्य एक दूसरा प्रश्न भी पैदा करता है—
अगर नक्सल हिंसा का सबसे बड़ा बोझ भी आदिवासी ही उठा रहा है, विकास की कमी का सबसे बड़ा बोझ भी आदिवासी उठा रहा है और विस्थापन का बोझ भी आदिवासी उठाता रहा है, तो फिर समाधान में उसकी आवाज सबसे मजबूत क्यों नहीं होनी चाहिए?
आदिवासी को केवल—
“नक्सल प्रभावित”
“विकास से पिछड़ा”
“सुरक्षा की समस्या”
“लाभार्थी”
या
“वोट बैंक”
के रूप में देखना बंद करना होगा।
वह नागरिक है।
वह संवैधानिक अधिकारों वाला नागरिक है।
वह निर्णय लेने वाला नागरिक है।
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आदिवासी को सुरक्षा चाहिए—लेकिन सुरक्षा के साथ सम्मान और न्याय भी चाहिए
आज भारत में नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या पहले की तुलना में काफी कम हुई है। गृह मंत्रालय के अनुसार 2025 में LWE हिंसा के आंकड़ों में 2010 की तुलना में भारी कमी आई और 2025 में विशेष रूप से LWE-प्रभावित जिलों की संख्या बहुत सीमित रह गई। फरवरी 2026 के आधिकारिक आंकड़ों में आठ LWE-affected districts सूचीबद्ध किए गए थे।
यह बदलाव महत्वपूर्ण है।
लेकिन यदि सुरक्षा सुधरती है और उसी समय स्थानीय व्यक्ति की जमीन, संस्कृति, ग्रामसभा और आजीविका कमजोर होती जाती है, तो क्या हमने समस्या की जड़ हल कर दी?
सिर्फ बंदूक की आवाज कम होना शांति नहीं है।
शांति तब होगी जब—
बच्चा सुरक्षित स्कूल जाए।
किसान अपनी जमीन पर सुरक्षित रहे।
महिला बाजार से सुरक्षित लौटे।
ग्रामसभा की बात सुनी जाए।
पुलिस पर भरोसा हो।
प्रशासन को देखकर डर नहीं, न्याय की उम्मीद पैदा हो।
और विकास परियोजना आने पर गांव के लोगों से पूछा जाए—
“आपके लिए विकास का अर्थ क्या है?”
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सबसे बड़ा आईना सरकार के साथ-साथ हमारे अपने नेताओं के लिए भी है
यहां सवाल सिर्फ दिल्ली का नहीं है।
सिर्फ राज्य सरकार का नहीं है।
सिर्फ प्रशासन का नहीं है।
सिर्फ पुलिस का नहीं है।
सवाल हमारे अपने नेतृत्व से भी है।
आज आदिवासी समाज के नाम पर अनेक संगठन हैं।
अनेक मंच हैं।
अनेक नेता हैं।
अनेक प्रतिनिधि हैं।
आरक्षित सीटों से निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं।
लेकिन हमें यह कठोर सवाल पूछना होगा—
क्या हमारी राजनीतिक आवाज उतनी मजबूत है जितनी हमारे संगठनों की संख्या?
क्या हमारे प्रतिनिधि संसद और विधानसभा में अपने समाज के वास्तविक सवालों को उतनी मजबूती से उठाते हैं जितनी चुनाव के समय नारे लगते हैं?
क्या हमारी ग्रामसभाएं अपने अधिकार जानती हैं?
क्या हमारे युवा अपने संविधान को पढ़ते हैं?
क्या हमारे समाज के प्रतिनिधि अपनी भाषा में कानून की किताबें तैयार कर रहे हैं?
क्या हम अपने बच्चों को इतिहास लिखना सिखा रहे हैं?
क्या हम अपने पुरखों की मौखिक परंपराओं को दस्तावेज में बदल रहे हैं?
क्या हम जमीन के कागज पढ़ने वाले युवाओं की पूरी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं?
यही असली आत्ममंथन है।
किसी एक नेता को गाली देने से समाज नहीं बदलेगा।
समाज तब बदलेगा जब समाज अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगना सीख जाएगा।
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“सूटकेस की राजनीति” से समाज नहीं बचेगा
आपके शब्दों में “सूटकेस” वाली राजनीति का दर्द है।
इसे किसी व्यक्ति पर बिना प्रमाण भ्रष्टाचार का आरोप बनाने के बजाय मैं इसे व्यापक राजनीतिक संस्कृति के रूप में देखता हूं।
जब राजनीति जनता की सेवा से हटकर पद, टिकट, ठेका, निजी लाभ और सत्ता के समीकरणों तक सीमित हो जाती है, तब सबसे पहले कमजोर समुदाय की आवाज कमजोर होती है।
और तब नेता जनता के बीच नहीं—
सत्ता के गलियारों में दिखाई देने लगता है।
समाज को ऐसे नेताओं की जरूरत नहीं जो सिर्फ चुनाव के समय आदिवासी बनें।
समाज को ऐसे प्रतिनिधि चाहिए जो—
संविधान पढ़ें।
पांचवीं अनुसूची पढ़ें।
PESA पढ़ें।
वन अधिकार कानून पढ़ें।
बजट पढ़ें।
जमीन का कानून पढ़ें।
ग्रामसभा की कार्यवाही पढ़ें।
और फिर विधानसभा तथा संसद में उसी ज्ञान के साथ सवाल पूछें।
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आरक्षण सिर्फ कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता नहीं—जिम्मेदारी का संविधानिक अवसर है
आरक्षण को केवल नौकरी या चुनावी सीट समझना बहुत छोटी सोच होगी।
आरक्षण का मूल उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से वंचित समुदायों को प्रतिनिधित्व और अवसर देना है।
अगर कोई व्यक्ति आरक्षित सीट पर पहुंचकर उसी समाज की आवाज नहीं बनता जिसके प्रतिनिधित्व के लिए वह चुना गया है, तो समस्या केवल उसकी नहीं है।
समस्या हमारी राजनीतिक चेतना की भी है।
इसलिए युवा पीढ़ी को नेताओं की पूजा नहीं करनी चाहिए।
नेताओं से सवाल करना चाहिए।
जाति, पार्टी, झंडा और व्यक्तिगत निष्ठा से ऊपर उठकर पूछना चाहिए—
«हमारी जमीन के कितने मामले सुलझे?»
«कितने सामुदायिक वन अधिकार मिले?»
«कितनी ग्रामसभाओं को वास्तविक शक्ति मिली?»
«कितने स्कूलों में स्थानीय भाषा में शिक्षा है?»
«कितने आदिवासी युवाओं को उच्च शिक्षा मिली?»
«कितने गांवों में स्वास्थ्य सुविधा पहुंची?»
«कितने विस्थापित परिवारों का न्यायपूर्ण पुनर्वास हुआ?»
«कितने आदिवासी गांवों में रोजगार पैदा हुआ?»
«हमारे पुरखों के इतिहास को स्कूल की किताब में जगह कब मिलेगी?»
यही सवाल लोकतंत्र को मजबूत करेंगे।
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आजादी का अर्थ केवल अंग्रेजों से मुक्ति नहीं है
आजादी का अर्थ यह भी है कि—
गरीब अपने अधिकार के लिए डरकर न जिए।
आदिवासी अपनी जमीन पर बेगाना न बने।
बच्चा अपनी भाषा बोलने में शर्म महसूस न करे।
महिला अपनी संस्कृति को बोझ न समझे।
युवा अपनी पहचान छिपाकर नौकरी पाने को मजबूर न हो।
ग्रामसभा सिर्फ कागज पर न रहे।
कानून किताब में बंद न रहे।
संविधान केवल 26 जनवरी और 15 अगस्त के भाषणों में न आए।
संविधान गांव तक पहुंचे।
यही वास्तविक आजादी है।
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आजादी के 80वें वर्ष में आदिवासी समाज को भावनात्मक राजनीति से आगे जाना होगा
मेरी युवा पीढ़ी से सबसे बड़ा अनुरोध यही है—
भावनात्मक राजनीति से बाहर आइए।
केवल अपने पुरखों की जय बोलने से पुरखों का सम्मान नहीं होगा।
उनके ज्ञान को बचाइए।
उनकी भाषा सीखिए।
उनके इतिहास को लिखिए।
उनकी जमीन का रिकॉर्ड समझिए।
ग्रामसभा में बैठिए।
संविधान पढ़िए।
कानून पढ़िए।
डेटा पढ़िए।
बजट पढ़िए।
RTI सीखिए।
डिजिटल दस्तावेज बनाइए।
अपने गांव का सामाजिक-आर्थिक सर्वे कीजिए।
अपनी भाषा का शब्दकोश बनाइए।
अपने बुजुर्गों के मौखिक इतिहास की रिकॉर्डिंग कीजिए।
अपने देवस्थलों का दस्तावेज तैयार कीजिए।
अपने पारंपरिक बीजों को सुरक्षित रखिए।
अपने जंगल का सामुदायिक मानचित्र बनाइए।
और सबसे जरूरी—
अपने बच्चों को सवाल करना सिखाइए।
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क्योंकि समाज को सबसे ज्यादा नुकसान बाहरी दुश्मन से नहीं, भीतर की बेहोशी से होता है
जिस समाज को अपने अधिकार का ज्ञान नहीं होता, उसका अधिकार कागज पर रह जाता है।
जिस समाज को अपनी भाषा पर गर्व नहीं होता, उसकी भाषा धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से गायब होती जाती है।
जिस समाज को अपना इतिहास लिखना नहीं आता, उसका इतिहास कोई और लिखता है।
जिस समाज के युवा राजनीति को केवल जाति, पार्टी और भावनाओं के चश्मे से देखते हैं, उसके वास्तविक मुद्दे चुनावी नारों में दब जाते हैं।
और जिस समाज के नेता जनता से सवाल पूछने के बजाय जनता को चुप रहने की आदत डाल देते हैं—
वह समाज लोकतंत्र में मौजूद होकर भी लोकतांत्रिक शक्ति से वंचित हो जाता है।
इसलिए अब जरूरत किसी एक नेता को महान बनाने की नहीं है।
जरूरत ऐसी पीढ़ी बनाने की है जो किसी भी नेता से सवाल पूछ सके।
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आदिवासी समाज को दया नहीं, अधिकार चाहिए
यह बात सबसे ज्यादा समझने की जरूरत है।
आदिवासी समाज को किसी की दया नहीं चाहिए।
उसे “गरीब आदिवासी” कहकर सहानुभूति के दो शब्द नहीं चाहिए।
उसे मंच पर नचाकर संस्कृति का प्रदर्शन नहीं चाहिए।
उसे चुनावी पोस्टर पर पारंपरिक वेशभूषा में फोटो नहीं चाहिए।
उसे केवल योजनाओं के लाभार्थियों की सूची में नाम नहीं चाहिए।
उसे चाहिए—
सम्मान।
प्रतिनिधित्व।
निर्णय में भागीदारी।
जल-जंगल-जमीन पर कानूनी अधिकार।
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा।
मातृभाषा में शिक्षा।
स्वास्थ्य।
रोजगार।
न्याय।
ग्रामसभा की वास्तविक शक्ति।
इतिहास में अपना स्थान।
और अपने भविष्य पर अपना अधिकार।
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और सरकार से भी एक सीधा सवाल
अगर आदिवासी क्षेत्रों में सड़क बनती है तो स्वागत है।
स्कूल बनते हैं तो स्वागत है।
अस्पताल बनते हैं तो स्वागत है।
मोबाइल नेटवर्क आता है तो स्वागत है।
रोजगार आता है तो स्वागत है।
लेकिन विकास का अर्थ यह नहीं हो सकता कि—
पहले जमीन लो, फिर आदमी हटाओ, फिर उसकी संस्कृति को संग्रहालय में रख दो और अंत में उसी विस्थापित व्यक्ति को “विकास का लाभार्थी” घोषित कर दो।
विकास की असली कसौटी यह होनी चाहिए—
क्या जिस गांव से संसाधन निकले, उस गांव के जीवन की गुणवत्ता भी बढ़ी?
क्या वहां के बच्चों का भविष्य बेहतर हुआ?
क्या स्थानीय लोगों को रोजगार मिला?
क्या ग्रामसभा की भूमिका मजबूत हुई?
क्या विस्थापन हुआ तो सम्मानजनक पुनर्वास हुआ?
क्या स्थानीय संस्कृति सुरक्षित रही?
अगर इन सवालों का जवाब “नहीं” है तो फिर हमें विकास की परिभाषा पर दोबारा विचार करना होगा।
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मेरी आजादी का सवाल
इसलिए जब 15 अगस्त को तिरंगा फहराया जाएगा, मैं भी तिरंगे के सामने सिर झुकाऊंगा।
क्योंकि यह देश मेरा भी है।
यह संविधान मेरा भी है।
यह लोकतंत्र मेरा भी है।
लेकिन उसी तिरंगे के सामने मैं यह सवाल भी पूछूंगा—
क्या उस बच्चे की आजादी पूरी है जिसकी मातृभाषा स्कूल में जगह पाने के लिए संघर्ष कर रही है?
क्या उस किसान की आजादी पूरी है जिसे अपनी ही जमीन के कागज के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?
क्या उस आदिवासी की आजादी पूरी है जिसकी ग्रामसभा की आवाज किसी फाइल के नीचे दब जाती है?
क्या उस समाज की आजादी पूरी है जिसकी संस्कृति मंच पर तो दिखाई जाती है, लेकिन नीति बनाने की मेज पर उसकी आवाज नहीं सुनाई देती?
क्या उस युवा की आजादी पूरी है जिसे अपने समाज के इतिहास को खुद खोजकर निकालना पड़ता है?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर संविधान ने अधिकार दिए हैं, तो वे अधिकार आदिवासी की जिंदगी में दिखाई क्यों नहीं देते?
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अब समय रोने का नहीं—जागने का है
युवा साथियों,
यह लड़ाई किसी जाति के खिलाफ नहीं है।
यह किसी धर्म के खिलाफ नहीं है।
यह किसी पार्टी के खिलाफ भी नहीं है।
यह अन्याय के खिलाफ है।
यह अज्ञान के खिलाफ है।
यह भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति के खिलाफ है।
यह अधिकारों के कागजीकरण के खिलाफ है।
यह अपनी जड़ों को भूलने के खिलाफ है।
और यह लड़ाई बंदूक से नहीं—
ज्ञान से जीतनी है।
संविधान से जीतनी है।
कानून से जीतनी है।
ग्रामसभा से जीतनी है।
शिक्षा से जीतनी है।
संगठन से जीतनी है।
दस्तावेज से जीतनी है।
लोकतांत्रिक संघर्ष से जीतनी है।
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युवा पीढ़ी के नाम आखिरी पुकार
जागो।
अपनी भाषा सीखो।
अपने पुरखों को जानो।
अपनी जमीन का इतिहास पढ़ो।
संविधान पढ़ो।
पांचवीं अनुसूची पढ़ो।
PESA पढ़ो।
वन अधिकार कानून पढ़ो।
ग्रामसभा को मजबूत करो।
अपने नेताओं से सवाल करो।
अपने गांव के बच्चों को पढ़ाओ।
अपने बुजुर्गों की बातें रिकॉर्ड करो।
अपनी संस्कृति का दस्तावेज बनाओ।
अपने अधिकारों का डिजिटल रिकॉर्ड बनाओ।
और सबसे जरूरी—
भावना में बहकर किसी नेता के पीछे मत चलो।
तथ्य लेकर अपने समाज के साथ चलो।
क्योंकि अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि—
“हमारा नेता कौन है?”
सवाल यह होना चाहिए—
“हमारा अधिकार क्या है और उसे लागू कौन करेगा?”
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए—
“कौन सी पार्टी हमारी है?”
सवाल होना चाहिए—
“कौन हमारे संविधानिक अधिकारों के लिए खड़ा है?”
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए—
“कौन हमारे समाज का सबसे बड़ा चेहरा है?”
सवाल होना चाहिए—
“कौन हमारे समाज के आखिरी व्यक्ति की आवाज बन रहा है?”
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और अंत में…
आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर मैं यह नहीं कहता कि आदिवासी समाज गुलाम है—कानूनी अर्थ में वह स्वतंत्र भारत का पूर्ण नागरिक है।
लेकिन मैं यह जरूर कहता हूं कि अगर किसी नागरिक को अपने ही देश में सम्मान, न्याय, भूमि, भाषा, शिक्षा, संस्कृति और निर्णय के अधिकार के लिए लगातार संघर्ष करना पड़े, तो उस स्वतंत्रता की गुणवत्ता पर सवाल उठाना लोकतंत्र का अधिकार है।
आजादी का मतलब केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं।
आजादी का मतलब है—
डर से मुक्ति।
भूख से मुक्ति।
अज्ञान से मुक्ति।
शोषण से मुक्ति।
अन्याय से मुक्ति।
अपनी पहचान मिटने के डर से मुक्ति।
और सबसे बढ़कर—
अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने की आजादी।
इसलिए इस 15 अगस्त को तिरंगा जरूर फहराइए।
राष्ट्रगान जरूर गाइए।
भारत माता का सम्मान जरूर कीजिए।
लेकिन उसी के साथ अपने गांव, अपनी जमीन, अपनी भाषा, अपने जंगल, अपने देव, अपने पुरखों और अपने बच्चों के भविष्य के लिए भी खड़े हो जाइए।
क्योंकि—
**जिस दिन आदिवासी अपने अधिकार को समझ लेगा,
जिस दिन युवा अपने संविधान को पढ़ लेगा,
जिस दिन ग्रामसभा अपनी शक्ति पहचान लेगी,
जिस दिन नेता से सवाल पूछना समाज की आदत बन जाएगी,
उस दिन आदिवासी समाज किसी का वोट बैंक नहीं रहेगा।**
वह अपने लोकतंत्र का निर्णयकर्ता बनेगा।
और शायद उस दिन हम सचमुच कह सकेंगे—
हाँ, अब आजादी सिर्फ दिल्ली में नहीं, गांव की चौपाल तक पहुंची है।
जय संविधान।
जय ग्रामसभा।
जय जल-जंगल-जमीन।
जय आदिवासी अस्मिता।
जय भारत।
डॉ विश्राम धुर्वे
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