स्वतंत्रता आंदोलन, जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम

 *स्वतंत्रता आंदोलन, जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम: राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्र निर्माण में आदिवासियों का अप्रतिम योगदान और बलिदान*

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1757 से 1947 तक का इतिहास आदिवासी क्रांतिकारियों के अद्वितीय बलिदान, शौर्य,स्वतंत्रता आंदोलन और 'जल, जंगल, जमीन' की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों से भरा हुआ है, जब देश के बड़े-बड़े राजा-महाराजा अंग्रेजों के सामने घुटने टेक रहे थे, तब देश के आदिवासी वीरों ने पारंपरिक हथियारों के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। आदिवासी समाज आदिकाल से ही जल, जंगल और जमीन का संरक्षक रहा है। उनका संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता,सामाजिक ताने-बाने और आध्यात्मिक पहचान को बचाने का था। आदिवासियों के लिए प्रकृति कोई उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि उनका देवत्व है। जब ब्रिटिश साम्राज्य ने उनकी इस पावन धरती पर कदम रखा और उनकी संप्रभुता को चुनौती दी, तो आदिवासियों की आध्यात्मिक चेतना और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम ने एक ऐसी क्रांति को जन्म दिया।जिसे अंग्रेजी साम्राज्य के जड़ो को हिला दिया।
*स्वतंत्रता संग्राम के महानायक और ऐतिहासिक घटनाएं (1757 - 1947)*-इतिहास के पन्नों में भले ही इन्हें वह स्थान न मिला हो जिसके वे हकदार थे, लेकिन 1757 से 1947 के बीच आदिवासियों का प्रतिरोध किसी भी अन्य आंदोलन से कहीं अधिक उग्र और व्यापक था।
*बाबा तिलका मांझी(1784-1785)*: मंगल पांडे से लगभग 70 साल पहले, तिलका मांझी ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाया था। उन्होंने भागलपुर के कलेक्टर क्लीवलैंड को तीर से मार गिराया। सन 1785 में उन्हें बरगद के पेड़ से लटकाकर फांसी दे दी गई।
*बुधू भगत और जोआ भगत (कोल विद्रोह - 1831-1832):*- छोटानागपुर क्षेत्र में ब्रिटिश कर प्रणाली और जमींदारों के खिलाफ कोल आदिवासियों ने ऐतिहासिक विद्रोह किया। बुधू भगत ने इस लड़ाई में अपने बेटों और सैकड़ों साथियों के साथ वीरगति प्राप्त की।अंग्रेजी राज और शोषण अत्याचार के विरूद्ध किया गया यह सबसे पहला स्वतंत्रता आंदोलन था।
*सिधु-कान्हू और चांद-भैरव (संथाल हुल - 1855):*- 1857 की क्रांति से ठीक पहले, संथाल भाइयों के नेतृत्व में 60,000 से अधिक आदिवासियों ने "करो या मरो" और "अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो" के नारे के साथ तीर-धनुष लेकर ब्रिटिश बंदूकों का सामना किया। इस महासंग्राम में करीब 20,000 संथालों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
*क्रांतिवीर टंट्या भील (1878-1889):*- मध्य प्रदेश के 'इंडियन रॉबिनहुड' कहे जाने वाले टंट्या भील ने अंग्रेजों के खजाने को लूटकर भूखे आदिवासियों का पेट भरा। गुरिल्ला युद्ध के इस नायक को अंग्रेजों ने धोखा देकर पकड़ा और फांसी दे दी।
*धरती आबा बिरसा मुंडा (उलगुलान - 1899-1900):*- बिरसा मुंडा ने न केवल अंग्रेजों के खिलाफ 'उलगुलान' (महान विद्रोह) का शंखनाद किया, बल्कि आदिवासी समाज को धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भी जगाया। उन्होंने नारा दिया—"रानी का शासन खत्म करो और हमारा राज्य स्थापित करो।" मात्र 25 वर्ष की आयु में रांची जेल में उनका रहस्यमयी निधन हो गया।
*अल्लूरी सीताराम राजू (रम्पा विद्रोह - 1922-1924):* आंध्र प्रदेश के मन्यम क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाले गैर-आदिवासी नेता, जिन्हें आदिवासियों ने अपना मसीहा माना। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ा।
*शहीद वीर नारायण सिंह (1857):* -छत्तीसगढ़ के सोनाखान के जमींदार, जिन्होंने अकाल के समय ब्रिटिश अनाज भंडारों को लूटकर जनता में बांट दिया। उन्हें रायपुर के जयस्तंभ चौक पर तोप से उड़ा दिया गया।
*रामजी गोंड और कुमराम भीम (1930-1940):*- हैदराबाद के निजाम और ब्रिटिश शासन के खिलाफ 'जल, जंगल, जमीन' का अमर नारा देने वाले कुमराम भीम ने अंतिम सांस तक जंग लड़ी।
इनके अलावा आदिवासी क्रांतिकारी
*गुंडाधुर (1910 - बस्तर का भूमकाल आंदोलन):*-छत्तीसगढ़ के बस्तर में अंग्रेजों के शोषणात्मक वन कानूनों के खिलाफ आदिवासियों ने गुंडाधुर के नेतृत्व में 'भूमकाल आंदोलन' किया। आम की टहनियों और लाल मिर्च को संदेश बनाकर पूरे बस्तर में क्रांति फैला दी गई थी, जिसने ब्रिटिश प्रशासन को पंगु बना दिया था।
*रानी गाइदिनल्यू (1930 का दशक):*- नागालैंड की इस वीर बेटी ने मात्र 13-14 वर्ष की आयु में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंका। उन्हें 'नागालैंड की झाँसी की रानी' भी कहा जाता है।
इनके अलावा सन 1757 से लेकर 1947 तक, देश की रक्षा और 'जल, जंगल, जमीन' की संप्रभुता बनाए रखने के लिए आदिवासी समाज ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ निरंतर सशस्त्र संघर्ष किया। तू तिरोत सिंह (मेघालय) ,तलक्कल चंदू (वायनाड करेल) गोकुल मीणा-भुवना मीणा (राजस्थान),राघोजी भांगरे(अहमदनगर महाराष्ट्र),शंकर शाह-रघुनाथ शाह (गढ़ मण्डला मध्यप्रदेश) हलधर-गिरधर (झारखंड) रानी रोपुइलियानी (मिजोरम),गैंदसिंह,रमोतिन माड़िया (परलकोट छत्तीसगढ) काली बाई भील (राजस्थान) बिजन्या-दोल्या (खंडवा मध्यप्रदेश) भीमा नायक भील-माँ सुरसी  (बडवानी मध्यप्रदेश)   खाज्या नाईक (बड़वानी मध्यप्रदेश),नीलाम्बर-पिताम्बर (गढ़वा, झारखंड) भागोजी नाईक (नासिक महाराष्ट्र) ,रघुनाथ सिंह मंडलोई (बड़वानी मध्यप्रदेश) ढीलावर के डेलन शाह (नरसिंहपुर मध्यप्रदेश) तेलंगा खड़िया (गुमला झारखंड) ,जतरा टाना भगत (गुमला झारखंड) वीर नानक जी भील (धनेश्वर राजस्थान) वीर हैपाऊ जादोनांग(कम्बीरान मणिपुर) नाग्या महादू कातकारी (रायगढ़ महाराष्ट्र) रेवजी भाई चौधरी (पालघर महाराष्ट्र) आवारी गुरूजी (नासिक महाराष्ट्र)वीर लक्ष्मण नायक (कोरापुट मलकानगिरि उड़ीसा) हुतात्मा केशरी चंद(उत्तराखंड) वीरांगना फूलो-झानों (साहेब गंज झारखंड) चक्र-बिशोई (उड़ीसा) शंभुधन फुंगलो (असम) ,जादोनांग (मणिपुर) तीरथ सिंह ,तोंगान नेंगभिंजा संगमा (मेघालय),तालोम रूकबो(अरूणांचल प्रदेश) अय्यनकालि (तिरुवनंतपुरम केरल) जैसे अनगिनत योद्धाओं ने हंसते-हंसते मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
 *ब्रिटिश दमन चक्र:-* काले कानून और क्रूरता का इतिहास
आदिवासियों के इस अभूतपूर्व और अदम्य साहस से ब्रिटिश साम्राज्य इस कदर खौफजदा हो गया था कि उसने इस पूरे समुदाय को ही कानूनन अपराधी घोषित करने की साजिश रच डाली। 
*क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट (1871):*-आदिवासियों के विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेजों ने इस काले कानून को लागू किया। इसके तहत मीना, भील, गोंड, संथाल जैसी कई जनजातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया। नवजात शिशुओं तक को अपराधी माना गया और उन्हें थानों में हाजिरी देनी पड़ती थी।
*आर्थिक रीढ़ तोड़ना:-* उनकी पारंपरिक आजीविका, कला और जमीनों को छीन लिया गया ताकि वे कभी दोबारा विद्रोह न कर सकें। आजादी के बाद 1952 में जाकर इस काले कानून को पूरी तरह निरस्त किया गया और इन्हें 'विमुक्त जाति' का दर्जा मिला।
भारतीय वन अधिनियम (1865, 1878, 1927): इन कानूनों के जरिए आदिवासियों को उनकी ही सदियों पुरानी जमीन और जंगलों से बेदखल कर दिया गया। वन उत्पादों को इकट्ठा करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे उनकी आजीविका पूरी तरह नष्ट हो गई।
*अमानवीय शोषण:-* अंग्रेजों ने आदिवासियों को बंधुआ मजदूर (बेगारी) बनने पर मजबूर किया। ईसाई मिशनरियों के माध्यम से उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को बदलने का पुरजोर प्रयास किया गया।
इतिहास में उपेक्षा यह भारत के आधिकारिक इतिहास लेखन की सबसे बड़ी विडंबना रही है कि जिन आदिवासियों ने स्वतंत्रता की वेदी पर सबसे पहले और सबसे बड़े बलिदान दिए, उन्हें मुख्यधारा के इतिहास में "विद्रोह" या "दंगा" कहकर हाशिए पर धकेल दिया गया।आज आजादी के दशकों बाद भी आदिवासी समाज अपनी पहचान, विस्थापन, कुपोषण और जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है। विकास के नाम पर उनकी जमीनों का अधिग्रहण और सांस्कृतिक क्षरण आज भी सबसे बड़ी चुनौती है।
*ऐतिहासिक न्याय:*-टाईगर और ट्राइबल जल,जंगल जमीन के बिना जिंदा नहीं रह सकते,जैसे टाइगर के सुरक्षा लिए सेव द टाइगर। वैसे ही ट्राइबल को सेव करने के लिए उनके संवैधानिक अधिकार जो  अस्मिता अस्तित्व पर आधारित विकास के तहत कानूनी संरक्षण: 5वी अनुसूची पेसा (PESA) कानून और वन अधिकार अधिनियम (2006) को जमीनी स्तर पर पूरी कड़ाई से लागू किया जाए।
समान विकास: जल, जंगल, जमीन के स्वामित्व को प्रभावित किए बिना शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के आधुनिक अवसर उन तक पहुंचाए जाएं।
राष्ट्रीय इतिहास और शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों की वीरगाथाओं को ससम्मान और विस्तार से शामिल किया जाए।
आदिवासी आंदोलन का इतिहास गवाह है कि "आदिवासी अंग्रेजों के सामने कभी झुके नहीं।" उन्होंने आधुनिक हथियारों से लैस विश्व की सबसे बड़ी औपनिवेशिक ताकत के सामने सिर झुकाने के बजाय मौत को गले लगाना बेहतर समझा। उनका बलिदान केवल देश को आजाद कराने के लिए नहीं था, बल्कि राष्ट्र निर्माण के उस मूल्य को स्थापित करने के लिए था जहां पर्यावरण और मनुष्य का सह-अस्तित्व सुरक्षित रहे।
आज का भारत यदि संप्रभु और समृद्ध है, तो उसकी नींव में इन अनगिनत जनजातीय शहीदों का रक्त शामिल है। स्वतंत्रता आंदोलन में आदिवासियों का अतीत गौरवशाली रहा है, और उनका सम्मान अक्षुण्ण रखना ही शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।राष्ट्र निर्माण में उनके इस अप्रतिम योगदान को शत-शत नमन!
           *विकेश कुमार हिचामी*
प्रदेश संयोजक नीति एवं अनुसंधान विभाग अनुसूचित जनजाति मोर्चा छत्तीसगढ

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