✍️अगर कोई जन्म से जनजाति है, तो किसके जन्म से, खुद के जन्म से, बाप के जन्म से, दादा के जन्म से? किसके जन्म से वो जनजाति है?
✍️अगर दादा का जन्म 1947 से पहले या यूँ कहें की संविधान की स्वीकारोक्ति 1950 से पहले हुआ है तो क्या वो जनजाति था. ✍️मान लीजिये आपके दादा का जन्म 1920 में हुआ था क्या वो जनजाति था और उसी के आधार पर आप अपने आप को जनजाति कहते हो। या आपके समुदाय को 1950 में पहली बार अनुसूचित जनजाति के रूप में पहचाना गया, उसके बाद यह जनजाति हुआ है।
✍️1950 में आपके पूर्वजों और उनके समुदाय को किस आधार पर जनजाति के रूप में पहचाना गया?
✍️1. संवैधानिक परिभाषा (अनुच्छेद 342): भारत के राष्ट्रपति को, हर राज्य के राज्यपाल से सलाह करके, उन जनजातियों या जनजातीय समुदायों को निर्दिष्ट करने की शक्ति दी गई थी जिन्हें अनुसूचित जनजाति (ST) माना जाएगा।
लेकिन निर्दिष्ट करेंगे कैसे? आधार बनाया गया अगले 2 और 3 नंबरों को.
✍️2. 1950 के संविधान में जनजाति की कोई सख्त, एक जैसी और वैज्ञानिक परिभाषा नहीं दी गई थी. इसके बजाय, जनजाति समुदायों की पहचान करने के लिए ऐतिहासिक रिकॉर्ड, पहले के औपनिवेशिक वर्गीकरण (जैसे कि गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935) और क्षेत्रीय जनगणना के आंकड़ों का सहारा लिया गया।
आखिर आदिवासियों का ऐतिहासिक रिकॉर्ड और औपनिवेशिक वर्गीकरण (जैसे कि गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935) का आधार क्या था? नंबर 3 में स्पष्ट है -- भौगोलिक और सामाजिक अलगाव, भाषा, रीति-रिवाज, और धार्मिक प्रथाएं।
✍️3. भौगोलिक और सामाजिक अलगाव: शामिल करने के लिए मुख्य बात उन समूहों की पहचान करना थी जो भौगोलिक रूप से काफी हद तक अलग-थलग रहते थे, जिनकी अपनी-अलग सांस्कृतिक पहचान (भाषा, रीति-रिवाज और धार्मिक प्रथाएं) थी, और जो तथाकथित मुख्यधारा के समाज से आर्थिक रूप से अलग-थलग रहते थे।
✍️मतलब आपके जनजाति होने का सबूत ऐतिहासिक रिकॉर्ड, औपनिवेशिक वर्गीकरण (जैसे कि गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट, 1935) जो भौगोलिक और सामाजिक अलगाव, भाषा, रीति-रिवाज, और धार्मिक प्रथाएं इत्यादि पर आधारित
थी।
✍️स्पष्ट है, आपकी अनुसूचित जनजाति की पहचान आपके जन्म से नहीं है.
✍️4. राज्य-वार सूचियाँ: ये सूचियाँ हर राज्य या केंद्र-शासित प्रदेश के आधार पर तैयार की गई थीं। हो सकता है कि किसी समुदाय को एक राज्य में जनजाति का दर्जा मिला हो, लेकिन दूसरे राज्य में उसे यह दर्जा न मिले, क्योंकि अलग-अलग इलाकों में जनजातियों की विशेषताएँ काफी अलग-अलग होती हैं।
✍️वास्तव में, 1950 में ऊपर वर्णित मानदंड के आधार पर पहली बार आपके पूर्वज को जनजाति पहचान मिली। एक बार अनुसूचित जनजातियों की पहचान हो जाने के बाद, जनजाति प्रमाण पत्र निर्गत करने की सुविधा के लिए मिसल रिकार्ड/खतियान माँगा जाता है जिसमें आपके समुदाय और आपके पूर्वज का विस्तृत जानकारी को पहचान बनाया जा सके. दरअसल यहीं से आप दावा करना शुरू करते हैं कि आप जन्म से ही जनजाति हैं, जबकि यह सच नहीं है। क्यूँकि हर साल मानदंड को नहीं मापा जा सकता है इसलिए मिसल/खतियान का इस्तेमाल किया जाता है जिसके आधार पर आपको जनजाति प्रमाण-पत्र मिलता है।
✍️स्वतंत्र भारत के तथाकथित मुख्यधारा बहस और जनजातियों को तथाकथित मुख्यधारा में शामिल करने के दृष्टिकोण से मानदंडों को सख्त नहीं रखा गया, धर्म के दरवाजे खोल दिए गए। ✍️भविष्य की बात ये है कि तथाकथित मुख्यधारा की सत्ता इंतजार कर रही है की जनजाति अपने आप को इतना ज्यादा बदल दें और धर्म में इतना ज्यादा घुस जाएँ और उन्हें हमेशा के लिए आरक्षण से मुक्त किया जा सके। क्योंकि तब आप किसी भी मानदंड में फिट नहीं बैठेंगे।
✍️क्या कोई जन्म से आदिवासी होता है?
वास्तव में जन्म से हर नवजात बच्चा आदिवासी होता है, बिना ईश्वर, बिना धर्म, बिना जाति के होता है. जिस प्रकार से आदि-मानव, बोलना सीखा, कपड़े पहनना सीखा, अपना शारीरिक, मानसिक, और समाज, राज्य का निर्माण करता गया. उसी प्रकार नवजात बच्चा सीखता है. विकासवादी सिद्धांत में अपने आप को आधुनिक शहरी चाल ढाल से दूर जंगलों में जो अभी भी अपने तरीके से जीते हैं उन्ही के चरित्र को चित्रण करने के लिए संभवतः आदिवासी शब्द का ईजाद हुआ. बेशक, भारत में फर्स्ट सेटलर्स (प्रथम निवासी) को ही आदिवासी की संज्ञा दी गयी है. लेकिन 'आदिवासी' शब्द क्या बस एक इंसान और इंसानी समुदाय का चरित्र मात्र है? ✍️✍️वास्तव में, यह एक जीवन दर्शन में तब्दील होता जान पड़ता है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह आदिकाल से रहने वाला आदिवासी समुदाय है। हम निस्संकोच होकर कह सकते हैं कि हर इंसान और हर जीव किसी-न-किसी प्रकार के अपने आदि-काल से ही जी रहा है। इसलिए सिर्फ आदिवासी ही आदि-काल से रहने वाला है एक बेतुकी बात है।
✍️वास्तव में आदिवासी एक पूरी सभ्यता है, पूरा दर्शन है। धरती माँ है और इस धरती की रक्षा करने वाला धरती आबा बिरसा हो सकता है। मुझे लगता है इस सभ्यता और दर्शन लिए चाहे तो हर कोई जी सकता है और अगर इस दर्शन के साथ जी सके तो आज नहीं तो कल कोई भी आदिवासी हो सकता है।
✍️किसी समुदाय को इंगित किये बिना हम इतना जरूर कह सकते हैं कि अपने आप को संविधानिक रूप से जनजाति में दर्ज करने के दृष्टिकोण से, मानदंडों को ध्यान में रखते हुए 1950 से अपने आप को बदलते हुए 50 सालों में भी अपने आप को आदिवासी की तरह ढाल सकता है और जनजाति होने का दावा कर सकता है। ऐसी स्थिति में आपको लगेगा की 1950 में जो छूट गया था उसे जनजातीय रूप में अभी पहचान किया जा रहा है, लेकिन हकीकत अलग हो सकता है।
मुद्दे की बात ये है की क्या आपको आरक्षण मुक्त करने के बाद भी आप आदिवासी के गुण-चरित्र लिए जीते रहेंगे।
✍️वास्तव में 1950 से पहले जब आरक्षण नहीं था तब भी लोग आदिवासी के गुण-चरित्र लिए जीते रहे थे और उसी के परिणाम स्वरुप अंततः उन्हें जनजाति का सुरक्षा कवच दिया गया। एक बात स्पष्ट है, 1950 के पहले से जो आदिवासी के गुण-चरित्र लिए जीते रहे, तथा जी रहे हैं, और भाषायी विभाजन में किसी खास मानव प्रजातियों से सम्बन्ध रखते हों, सभी कोई आदिवासी हो सकते हैं लेकिन 1950 के बाद पहचाने गए सभी जनजाति आदिवासी नहीं हो सकते।
✍️थोड़ा और गंभीर और गहराई में जाएँ तो आदिवासियों के बीच में भी विभिन्न भाषायी विभाजन में अपने आप को सामुदायिक पहचान के रूप में दर्ज करना ज्यादा स्वीकार्य महसूस करते हैं। जैसे: लोगों को आपने यह कहते सुना होगा कि हम संताल हैं, आदिवासी नहीं; हम गोंड हैं, आदिवासी नहीं, इत्यादि।
✍️जन्म से आप किसी कबीले के होते हैं, और उस कबीला का एक भाषा किसी खास समूह का होता है और उस समूह का एक खास चरित्र होता है जो उसे आदिवासी बनाता है। और बदलते समय में इतिहास और भूगोल कोई भी करवट ले सकता है और ये भी हो सकता है जो व्यक्ति अभी आदिवासी नहीं है आने वाले 100/1000 साल में अपने जीवन-चरित्र के आधार पर आदिवासी हो सकता है।।
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