छुट्टी का अर्थ केवल कार्यालय बंद होना नहीं है

छुट्टी का अर्थ केवल कार्यालय बंद होना नहीं है


शासन द्वारा कर्मचारियों को विभिन्न पर्वों एवं अवसरों पर अवकाश प्रदान किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल कार्यालयों को बंद रखना नहीं, बल्कि कर्मचारियों को अपने परिवार, बच्चों, माता-पिता और सामाजिक जीवन के लिए समय देना तथा मानसिक एवं शारीरिक विश्राम प्रदान करना भी है।
परंतु वर्तमान में एक नई कार्यसंस्कृति विकसित होती दिखाई दे रही है। रविवार, सार्वजनिक अवकाश अथवा किसी बड़े त्योहार के ठीक पहले या बाद में समीक्षा बैठकें निर्धारित कर दी जाती हैं। कभी जनप्रतिनिधियों की बैठक, कभी प्रभारी मंत्री की समीक्षा, कभी विभागीय मंत्री, सचिव, विभागाध्यक्ष अथवा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक—और प्रत्येक बैठक के लिए अलग-अलग प्रारूप में जानकारी एवं प्रस्तुतिकरण तैयार करने का दबाव अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर आता है।
ऐसे में प्रश्न यह है कि कर्मचारी बैठक की तैयारी करे या अपना वास्तविक शासकीय कार्य करे?
यदि बैठक सोमवार को है तो रविवार तैयारी में निकल जाता है। त्योहार के अगले दिन समीक्षा है तो त्योहार का दिन आंकड़े, पत्रक और प्रस्तुतिकरण बनाने में बीतता है। परिणामस्वरूप शासन द्वारा दिया गया अवकाश कागजों में तो अवकाश रहता है, पर व्यवहार में कर्मचारी के लिए वह कार्यदिवस बन जाता है।
इसके साथ ही अवकाश के दिनों में “मुख्यालय न छोड़ने” अथवा शहर/जिले से बाहर जाने के लिए अनुमति लेने जैसी व्यवस्थाओं का अत्यधिक प्रयोग भी पुनर्विचार योग्य है। कर्मचारी का परिवार किसी दूसरे जिले में हो सकता है; उसे अपने बच्चों या माता-पिता को लाने-ले जाने जाना पड़ सकता है। तीन दिनों का अवकाश मिलने पर वह परिवार के साथ अपने गृह नगर या किसी अन्य स्थान पर जाना चाहे, तो सामान्य परिस्थितियों में उसके निजी समय का सम्मान होना चाहिए। केवल वास्तविक प्रशासनिक आवश्यकता, आपातकालीन ड्यूटी अथवा लागू सेवा नियमों के अनुसार आवश्यक परिस्थितियों में ही ऐसी पाबंदियां लगनी चाहिए।
सार्वजनिक अवकाश, रविवार एवं प्रमुख त्योहारों के दिन तथा यथासंभव उनके ठीक पहले/बाद समीक्षा बैठकें निर्धारित न की जाएं। अत्यावश्यक परिस्थितियां इसका अपवाद हो सकती हैं, लेकिन अपवाद को नियमित कार्यप्रणाली नहीं बनाया जाना चाहिए।
सरकारी कर्मचारी मशीन नहीं है।
उसका भी परिवार है, बच्चे हैं, माता-पिता हैं और सामाजिक उत्तरदायित्व हैं। लगातार बैठकों, सूचनाओं और अवकाश के दिनों में भी कार्यालयीन तैयारी का दबाव कार्यक्षमता बढ़ाने के बजाय मानसिक तनाव, पारिवारिक असंतुलन और कार्य की गुणवत्ता में कमी का कारण बन सकता है।
हमारा निवेदन केवल इतना है
“काम के समय पूरी जिम्मेदारी से काम हो,
और अवकाश के समय कर्मचारी को वास्तव में अवकाश मिले।”
एक स्वस्थ, तनावमुक्त और पारिवारिक रूप से संतुलित कर्मचारी ही शासन को अपनी सर्वोत्तम कार्यक्षमता दे सकता है। इसलिए अवकाश का सम्मान कर्मचारी की सुविधा मात्र नहीं, बल्कि बेहतर प्रशासनिक कार्यसंस्कृति की आवश्यकता भी है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

स्त्री का साथ

सहजीविता

🌿 *9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर संदेश* 🌿