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नक्सलमुक्त बस्तर में अब जुए का खेल!

 नक्सलमुक्त बस्तर में अब जुए का खेल! बस्तर में खुलेगा प्रदेश का पहला मिनी कैसीनो, आदिवासियों को विकास चाहिए या जुए की लत? . . . नक्सलवाद से मुक्ति का सपना बस्तर ने इसलिए देखा था कि यहां के बच्चों को शिक्षा मिले, युवाओं को रोजगार मिले, आदिवासियों के जीवन में खुशहाली आए और विकास की नई इबारत लिखी जाए। लेकिन अब बीजापुर से सामने आ रही मिनी कैसीनो की खबर ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है क्या नक्सलमुक्त बस्तर में अब जुए का कारोबार पैर पसारने जा रहा है? बताया जा रहा है कि बीजापुर जिले के अंतिम छोर पर तिमेड के पास मिनी कैसीनो के लिए निर्माण कार्य किया जा रहा है। दावा है कि यहां लाखों-करोड़ों रुपये के दांव लगाए जा सकेंगे। बस्तर के इतिहास में यह अपने आप में गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला है कि जिस इलाके ने दशकों तक हिंसा, भय और पिछड़ेपन का दंश झेला, वहां अब जुए के अड्डे जैसी व्यवस्था खड़ी करने की तैयारी क्यों हो रही है? मामले की जानकारी मिलने पर क्षेत्रीय विधायक विक्रम सिंह मंडावी मौके पर पहुंचे। उनके मुताबिक, उन्हें भी इसकी जानकारी नहीं थी। मौके पर निर्माण कार्य जारी मिला और पूछताछ में मिनी क...

*सभी पुलिस कर्मियों/सरकारी कर्मियों के लिए जीवनपयोगी महत्वपूर्ण निर्देश:*

 *सभी पुलिस कर्मियों/सरकारी कर्मियों के लिए जीवनपयोगी महत्वपूर्ण निर्देश:* 0️⃣1️⃣. समय पर अपना आवास बनाएं सरकारी क्वार्टर या लाइन के आवास अस्थायी सुविधाएं हैं। 45-50 की उम्र में घर बनाने के तनाव से बेहतर है कि नौकरी के शुरुआती वर्षों में ही ग्रामीण या शहरी क्षेत्र में अपनी एक निजी छत सुनिश्चित करें, ताकि परिवार को स्थायित्व मिले। 0️⃣2️⃣. परिवार और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें ड्यूटी का चक्र कभी खत्म नहीं होगा। याद रखें, बल में आपकी जगह तुरंत कोई अन्य जवान ले लेगा, लेकिन आपके परिवार के लिए आपकी जगह कोई नहीं भर सकता। छुट्टियों का सही उपयोग करें और परिवार को समय दें। 0️⃣3️⃣. पदोन्नति की अंधी दौड़ से बचें फिता/रैंक (Rank) के पीछे भागने के बजाय अपनी पेशेवर दक्षता (Investigative Skills, Cyber/Technical Proficiency, Duty Ethics) को निखारें। पदोन्नति समय पर मिले तो ठीक, वरना अपनी व्यक्तिगत प्रगति और शांति पर ध्यान दें। 0️⃣4️⃣. गुटबाजी और गपशप से दूर रहें थाने या बैरक की नकारात्मक राजनीति, गुटबाजी और साथियों/वरिष्ठों की चुगली से खुद को बचाएं। ऐसी चर्चाएं आपकी छवि और मानसिक शांति दोनों को नुक...
 मेरी उम्र 48 वर्ष है। मैं एक पैथोलॉजिस्ट हूं। पिछले 23 वर्षों से मृत लोगों के पोस्टमार्टम करता आ रहा हूं। तीन महीने पहले मैंने अपनी मां का पोस्टमार्टम किया। अपने हाथों से। यह सुनने में भयानक लगता है। मैं जानता हूं। लेकिन मुझे आपको बताना होगा कि मुझे उनके शरीर के अंदर क्या मिला। क्योंकि यह आपकी जान बचा सकता है। या आपकी मां की। आपके पिता की। आपके पति की। मेरी मां की उम्र 74 वर्ष थी। अपने जीवन के आखिरी तीन वर्षों में वह धीरे-धीरे बुझती चली गईं। चुपचाप। हवा में रखे दीये की तरह। सब कुछ थकान से शुरू हुआ। बहुत भारी और पूरी तरह तोड़ देने वाली थकान। सुबह उठते समय वह इतनी थकी होती थीं, जैसे पूरी रात सोई ही न हों। फिर पेट फूलना शुरू हुआ। वह बहुत कम खाती थीं, लेकिन उनका पेट हमेशा फूला रहता था। इसके बाद उनका वजन कम होने लगा। चेहरा भूरा और बेजान हो गया। त्वचा सूख गई। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे दिखाई देने लगे। मैं हर दिन मृत लोगों के साथ काम करता हूं। फिर भी अपनी मां के जीवित रहते हुए मैं यह नहीं समझ पाया कि उनके साथ क्या हो रहा था। मैंने सोचा कि यह उम्र का असर है। वह 74 वर्ष की थीं। मैं और क्...

छुट्टी का अर्थ केवल कार्यालय बंद होना नहीं है

छुट्टी का अर्थ केवल कार्यालय बंद होना नहीं है शासन द्वारा कर्मचारियों को विभिन्न पर्वों एवं अवसरों पर अवकाश प्रदान किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल कार्यालयों को बंद रखना नहीं, बल्कि कर्मचारियों को अपने परिवार, बच्चों, माता-पिता और सामाजिक जीवन के लिए समय देना तथा मानसिक एवं शारीरिक विश्राम प्रदान करना भी है। परंतु वर्तमान में एक नई कार्यसंस्कृति विकसित होती दिखाई दे रही है। रविवार, सार्वजनिक अवकाश अथवा किसी बड़े त्योहार के ठीक पहले या बाद में समीक्षा बैठकें निर्धारित कर दी जाती हैं। कभी जनप्रतिनिधियों की बैठक, कभी प्रभारी मंत्री की समीक्षा, कभी विभागीय मंत्री, सचिव, विभागाध्यक्ष अथवा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक—और प्रत्येक बैठक के लिए अलग-अलग प्रारूप में जानकारी एवं प्रस्तुतिकरण तैयार करने का दबाव अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर आता है। ऐसे में प्रश्न यह है कि कर्मचारी बैठक की तैयारी करे या अपना वास्तविक शासकीय कार्य करे? यदि बैठक सोमवार को है तो रविवार तैयारी में निकल जाता है। त्योहार के अगले दिन समीक्षा है तो त्योहार का दिन आंकड़े, पत्रक और प्रस्तुतिकरण बनाने में बीतता है। ...

*एक विनम्र प्रार्थना*

 प्रिय मित्रों,  *एक विनम्र प्रार्थना* ईश्वर की असीम कृपा है कि आज हम एक सुरक्षित सोसाइटी में रहते हैं। हमारे घरों में पर्याप्त राशन है, स्टोर से सामान भी आ रहा है, और सच कहें तो शायद हममें से किसी को कल की भूख का कोई डर भी नहीं है। लेकिन ज़रा एक पल के लिए अपनी बालकनी से बाहर झाँककर या अपनी भरी हुई थाली से नज़रें हटाकर सोचिए क्या हमारे आस-पास की दुनिया में हर घर की कहानी यही है? इसीलिए, अपने इस बड़े परिवार (सोसाइटी) के सभी सदस्यों से मेरी एक हृदयस्पर्शी गुज़ारिश है *👉 सादगी अपनाएं:* अगर आपकी थाली में रोज़ 2 सब्ज़ियाँ सजती हैं, तो कृपया कुछ दिन 1 से ही संतोष कर लें। *👉 संसाधन बचाएं:* जितनी ज़रूरत हो बस उतना ही पकाएं। *👉 अन्न का सम्मान करें:* भूल से कुछ बच भी जाए, तो उसे प्रसाद समझकर अगले पहर ग्रहण कर लें, कूड़ेदान में अन्न का एक दाना भी न जाने दें। हमारी जेबें और साधन शायद हमें महीनों का राशन जमा करने की अनुमति दे दें, लेकिन बाज़ार में संसाधन सीमित हैं। हमारी 'अतिरिक्त चाहत' या 'होर्डिंग (जमाखोरी)' किसी और की 'आखिरी उम्मीद' को छीन सकती है। एक और महत्वपूर्ण बात...

WAMIS PORTAL CHHATTISGARH

  छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग (PWD) में निर्माण कार्यों की पारदर्शिता और गति बढ़ाने के लिए विष्णु देव साय कैबिनेट ने अगस्त 2026 में ही 'वमिस' (WAMIS - Works and Accounts Management Information System) डिजिटल सिस्टम के प्रथम चरण को मंजूरी दी है । इसे C-DAC पुणे द्वारा विकसित किया गया है। [1] चूंकि यह छत्तीसगढ़ में एक नया और हाल ही में स्वीकृत सिस्टम है, इसके सुचारू रूप से लागू होने और पूर्ण पोर्टल पंजीकरण प्रक्रिया शुरू होने से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं: छत्तीसगढ़ वमिस (WAMIS) के मुख्य तथ्य एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म : इस सिंगल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कार्यों के e-Estimation (प्राकलन), e-Procurement (निविदा), e-Measurement Book (ई-माप पुस्तिका) और सीधे ऑनलाइन बिल भुगतान (Bill Payments) प्रबंधित किए जाएंगे। [1] चरणबद्ध शुरुआत : यह प्रणाली सबसे पहले छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग (PWD) में लागू की जा रही है और इसके बाद इसे अन्य निर्माण विभागों में भी विस्तारित किया जाएगा। [1] रियल-टाइम मॉनिटरिंग : कार्यों के डीपीआर (DPR) तैयार करने से लेकर प्रशासनिक स्वीकृति और गुणवत्ता...

इथेनॉल

 इथेनॉल कई लोग कह रहे हैं कि गन्ने से इथेनॉल बन रहा है इसलिए चीनी महंगी हो रही है. वास्तव में इन लोगों को यह भी नहीं पता है कि चीनी कैसे बनती है और इथेनॉल कैसे बनता है. इनको यह भी नहीं पता की अगर आज इथेनॉल नहीं बिक रहा होता तो चीनी सौ में भी नहीं मिलती.  वास्तविकता यह है कि गन्ने से मुख्य रूप से चीनी बनाइ जाती है. चीनी बनाने के बाद गन्ने का बेगास (खोई) निकलती है, यह बायलर में जलाने के काम आती है इसके अलावा इससे पेपर और पार्टिकल बोर्ड (एक तरह का प्लाई वूड जिससे स्पीकर बॉक्स बनते हैं) बनाया जाता है  लगभग दस किलोग्राम गन्ने से एक किलोग्राम चीनी बनती है. बाकी सब बेगास, शीरा और मैली बन जाता है. मैली से जैविक खाद बनाई जाती है. शीरे से जो इथेनॉल बनता है उससे पहले केवल शराब और स्पिरिट (इथेनॉल में कॉपर सल्फेट का मिश्रण) बनती थी.  शराब और स्परिट की खपत बहुत कम है इसलिए पहले बड़े बड़े खड्डों में शीरा डाल दिया जाता था या फिर नालों में वह दिया जाता था. जबसे इथेनॉल को पेट्रोल में मिक्स किया जाने लगा है, तब से शीरे को फेंकना बंद हो गया है और इससे शुगर मिल को अतिरिक्त आमदनी होती है....

आजादी के 80 दशक

 आजादी के 80 दशक बाद भी आदिवासी गुलाम है न उनकी भाषा बची,न जमीन बचा ,न संस्कृति बची ,न देव बचा ,न देवालय ,शिक्षा बची,न पुरखों का इतिहास बचा बचा है तो लाचारी जिनको न सत्ता सुनती है न ही सरकार,न प्रशासन न पुलिस हर तरफ से आदिवासी हाशिए पर है जहां सिर्फ कटना उनको है .. आखिर 80 दशक बाद इतने संविधान में अधिकार है फिर लाचारी वो जमीन पर कही नहीं बचा आज आदिवासियों के नाम पर भारत में सबसे ज्यादा संगठन पर सभी सूटकेश के लिए और आरक्षित नेता कुत्ता से बत्तर हो गया है न बोलता है न सुनता है मै कैसे आजादी मनाऊं जब मेरे समाज को नक्सली देशद्रोही विकास बाधक इस देश की सत्ता कहती है मै युवा पीढ़ी से अनुरोध करता हु जागो और भावनात्मक राजनीति समाज नीति से बाहर आओ समाज को इस दलदल से निकालना आपकी जिम्मेदारी है.. आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर आदिवासी समाज का सबसे बड़ा सवाल: आखिर यह कैसी आज़ादी है? “आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी अगर किसी समाज को अपनी जमीन, जंगल, भाषा, संस्कृति, देवस्थल, शिक्षा, सम्मान और अपने भविष्य के लिए लगातार लड़ना पड़े, तो सवाल सिर्फ उस समाज से नहीं—पूरी व्यवस्था से पूछा जाना च...

क्या कोई जन्म से जनजाति होता है?

 ✍️क्या कोई जन्म से जनजाति होता है? ✍️अगर कोई जन्म से जनजाति है, तो किसके जन्म से, खुद के जन्म से, बाप के जन्म से, दादा के जन्म से? किसके जन्म से वो जनजाति है?  ✍️अगर दादा का जन्म 1947 से पहले या यूँ कहें की संविधान की स्वीकारोक्ति 1950 से पहले हुआ है तो क्या वो जनजाति था. ✍️मान लीजिये आपके दादा का जन्म 1920 में हुआ था क्या वो जनजाति था और उसी के आधार पर आप अपने आप को जनजाति कहते हो। या आपके समुदाय को 1950 में पहली बार अनुसूचित जनजाति के रूप में पहचाना गया, उसके बाद यह जनजाति हुआ है।  ✍️1950 में आपके पूर्वजों और उनके समुदाय को किस आधार पर जनजाति के रूप में पहचाना गया?  ✍️1. संवैधानिक परिभाषा (अनुच्छेद 342): भारत के राष्ट्रपति को, हर राज्य के राज्यपाल से सलाह करके, उन जनजातियों या जनजातीय समुदायों को निर्दिष्ट करने की शक्ति दी गई थी जिन्हें अनुसूचित जनजाति (ST)  माना जाएगा।  लेकिन निर्दिष्ट करेंगे कैसे?  आधार बनाया गया अगले 2 और 3 नंबरों को.   ✍️2. 1950 के संविधान में जनजाति की कोई सख्त, एक जैसी और वैज्ञानिक परिभाषा नहीं दी गई थी. इसके बजाय, ज...

स्वतंत्रता आंदोलन, जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम

 *स्वतंत्रता आंदोलन, जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम: राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्र निर्माण में आदिवासियों का अप्रतिम योगदान और बलिदान* भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1757 से 1947 तक का इतिहास आदिवासी क्रांतिकारियों के अद्वितीय बलिदान, शौर्य,स्वतंत्रता आंदोलन और 'जल, जंगल, जमीन' की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों से भरा हुआ है, जब देश के बड़े-बड़े राजा-महाराजा अंग्रेजों के सामने घुटने टेक रहे थे, तब देश के आदिवासी वीरों ने पारंपरिक हथियारों के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। आदिवासी समाज आदिकाल से ही जल, जंगल और जमीन का संरक्षक रहा है। उनका संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता,सामाजिक ताने-बाने और आध्यात्मिक पहचान को बचाने का था। आदिवासियों के लिए प्रकृति कोई उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि उनका देवत्व है। जब ब्रिटिश साम्राज्य ने उनकी इस पावन धरती पर कदम रखा और उनकी संप्रभुता को चुनौती दी, तो आदिवासियों की आध्यात्मिक चेतना और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम ने एक ऐसी क्रांति को जन्म दिया।जिसे अंग्रेजी साम्राज्य के जड़ो को हिला दिया। *स्वतंत्रता सं...

🌿 *9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर संदेश* 🌿

 *सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग, जगदलपुर का विश्व आदिवासी मूलनिवासी दिवस के पूर्व संध्या समाज के नाम संदेश* 🌿 *9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर संदेश* 🌿 बस्तर के मूलनिवासी एवं आदिवासी समाज के नाम जोहार बस्तर! सेवा जोहार! जोहार आदिवासी समाज! बस्तर की धरती केवल मिट्टी का भू-भाग नहीं है। यह हमारे पूर्वजों की स्मृतियों, संघर्षों, संस्कृति, परंपराओं, भाषा, प्रकृति और सामुदायिक जीवन की जीवंत पहचान है। 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस हमारे लिए केवल बधाई और उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, अस्मिता, अधिकार और भविष्य पर विचार करने का ऐतिहासिक अवसर है। आज आवश्यकता है कि हम स्वयं से सवाल करें— क्या हम अपने अधिकारों को जानते हैं? क्या हमारी ग्रामसभाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं? क्या हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को समझ रही है? और क्या हम अपने जल, जंगल, जमीन तथा सामुदायिक संसाधनों की रक्षा के लिए एकजुट हैं? संविधान ने हमें केवल अधिकार नहीं दिए, जिम्मेदारी भी दी है। बस्तर के अनुसूचित क्षेत्रों में पाँचवीं अनुसूची, पेसा कानून और ग्रामसभा की संवैधानिक ...

*पुरखों की विरासत बनाम बाहरी हस्तक्षेप*

 *पुरखों की विरासत बनाम बाहरी हस्तक्षेप*  हमारी संस्कृति, बोली-भाषा, परब-पंडुम, पहनावा एवं रूढ़ि-नेंग ही हमारी वास्तविक पहचान हैं। कोया जब गर्भ में होता है, तभी से उसे प्रकृति की रक्षा और प्राकृतिक शिक्षा का ज्ञान मिलने लगता है। आज बुजुर्गों से दूरी के कारण युवा अवश्य भटक रहे हैं, किंतु उनकी अस्मिता उनके अनादिकालीन परंपरा और संस्कृति में ही निहित है। हमारे पूर्वजों ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा तथा अपनी संस्कृति में बाह्य हस्तक्षेप के विरुद्ध संघर्ष किया है, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं; जैसे — संथाल विद्रोह (1855-56), मुंडा उलगुलान (1899-1900), हल्बा डोंगर आंदोलन (1774-1779), कोया विद्रोह, भील और कोल आंदोलन। यदि इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि को खंगाला जाए, तो स्पष्ट होगा कि हमारे पूर्वज सदैव बाहरी हस्तक्षेप के विरोध में खड़े रहे। हमारे पुरखों को भली-भांति ज्ञात था कि हमारी संस्कृति, परब-पंडुम एवं नेंग-जोग में हस्तक्षेप कर हमें अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया जाएगा। उन्हें यह भी स्पष्ट था कि हमारी परंपराओं को अपने ग्रंथों के समान बताकर मितव्यवहार के माध्यम से हमारे निकट आया...

ST SC। पर धर्म परिवर्तन का असर

 यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है, जिसे स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है। आपकी इमेज में जो दावा किया गया है, वह पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि यह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच के एक बड़े कानूनी अंतर को नजरअंदाज करता है। भारतीय कानून के अनुसार स्थिति इस प्रकार है: 1. अनुसूचित जाति (SC) के लिए नियम अनुसूचित जाति के मामले में यह पोस्ट आंशिक रूप से सही है। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, केवल वही व्यक्ति SC का दर्जा प्राप्त कर सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानता हो। यदि कोई SC सदस्य ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, तो वह अपना SC दर्जा और उससे मिलने वाला आरक्षण खो देता है। सुप्रीम कोर्ट में अभी भी इस पर विचार चल रहा है कि क्या दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को भी SC का दर्जा मिलना चाहिए, लेकिन फिलहाल कानून वही है जो ऊपर बताया गया है। 2. अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए नियम (आपका मुख्य क्षेत्र) इमेज में किया गया दावा अनुसूचित जनजाति (ST) पर लागू नहीं होता। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। ST का दर्जा धर्म पर आधारित नहीं है, बल्कि यह 'जातीय पहचान' और ...

**पेनकड़ा के आवश्यक दिशा~निर्देश /चेतावनी**

 **पेनकड़ा के आवश्यक दिशा~निर्देश /चेतावनी** —""लिंगो पेनकड़ा वल्लेकनार्र में आपका हार्दिक स्वागत/सेवा~जोहार"":—🙏🙏🙏 बुमकाल कृपया ध्यान रहे......! १-जूता-चप्पल,बेल्ट,फुलपैंट,पायजामा वर्जित है।आप धोती-लुहंगी पहनकर ही पेनकड़ा/जतरा के निर्धारित परिधि में प्रवेश कर सकते हैं। २-कैमरा -मोबाईल से फोटोग्राफी-वीडियो ग्राफी प्रतिबंधित है। कार्यालय दस्तावेजीकरण के रुप में केवल अधिकृत व्यक्ति ही करेंगे। ३- पेन बानाओं में अगरबत्ती/सिंदुर/चुनरी चढ़ाना भी प्रतिबंधित है। कृपया प्रतिबंधित सामाग्रियों को लेकर न जायें।अगरबत्ती के स्थान पर धूप/नीबू/लाली का ही उपयोग करेंगे। ४-किसी भी पेन बानाओं को छूना सक्त मना है । कृपया निर्धारित दूरी से ही पेनों का दर्शन करेंगे। ५-यू-ट्युबरों,रील्स बनाने वालों को भी निर्देश है कि  समिति द्वारा अधिकृत व्यक्ति के बिना लिंगो पेन से संबंधित आडियो- विडियो क्लिप्स शेयर नहीं करेंगे और न ही जप लिंगो पेन या पेन बानाओं के संबंध में कोई भी सगाजन उल्टी-सीधी जानकारी नहीं देंगे। ६-पेनकड़ा ""नो पाॅलिथीन जोन""  घोषित है।डिस्पोजल गिलास,डिस्पोजल प्ल...

*लिंगो संग बानी बिरादरी*

 *लिंगो संग बानी बिरादरी*  चलो जतरा चैत पुन्नी के,   लिंगो जी ने बुलाया है। अठारह बाजा, अठारह डाका,   बानी बिरादरी से सजाया है। प्राचीन जीवन-दर्शन की नींव रख,   अस्तित्व की राह दिखाया है। गुरु की पदवी पर विराजे जो,   आराध्य पेनों को मार्ग बताया है। वल्लेकनार्र, अंतागढ़ से नेवता,   बानी बिरादरी को बुलाया है। चलो जतरा चैत पुन्नी के,   लिंगो जी ने बुलाया है। एक बानी करे माटी सेवा,   एक भाई जल भर लाया है। मउर फूलों से सजा बजार,   कलार भाई मंद लाया है। एक चाक में बने दिया-करसा,   कोष्ठा ने पालो भिजवाया है। बज उठे घुँघरू और तुर्रा,   तेली भाई तेल लाया है। चलो जतरा चैत पुन्नी के,   लिंगो जी ने बुलाया है। एक बानी घर के मुर्रा लाई,   पारधी ने चाउर पिसाया है। सोना-चाँदी के सजे आभूषण,   एक भाई प्रहरी को औजार दिलाया है। साज सजे मंडा चारों ओर,   मूर्र ने जीवा में बसाया है। गाड़ा के बाजा डम-डम बाजे,   लिंगो ने कोया बुम जगाया है। चलो जतरा चैत पुन्नी के,   लिंगो जी ने बुलाया है।  ✍️धर्मपाल कोड़ापे

*पेंशन*

  *पेंशन*                        *जब बालों में चांदी जैसी चमक आने लगे,* *घुटनों में कट-कट का मधुर संगीत गूँजने लगे,* *और बिना चश्मे के दुनिया 4K में न दिखे—* *तब नौकरीपेशा की महबूबा कहती है—* *“अब आप सेवानिवृत्त हो रहे हैं,* *लेकिन मैं आपकी ऐसी नायिका हूँ…* *जो आपको कभी नहीं छोड़ूंगी…”* *उस नायिका का नाम है—* *पैंशन!* *वाह, वाह…* *ये है ऐसी वफादार प्रेमिका,* *जो हर महीने आती है और कहती है—* *“डार्लिंग, मैं आ गई हूँ,* *अब मैं पूरे महीने तुम्हारे साथ रहूँगी!”* *ये नखरे नहीं करती, कभी डेट मिस नहीं करती,* *कभी ब्रेकअप नहीं करती,* *कभी मूड खराब नहीं करती।* *ये है ऐसी सरल, सुंदर और संस्कारी नायिका,* *इसे देखकर दिल कहता है—* *“मैं तुमसे प्यार करता रहूँगा… जीवन भर!”* *जवानी में नौकरी* *पहली नज़र के प्यार जैसी होती है,* *लेकिन पैंशन* *जीवन भर के हनीमून जैसी होती है* *मीठा, शांत, स्थिर और सहारा देने वाला।* *और जब शाम को* *हम चाय और नाश्ते के साथ बैठते हैं,* *तब पैंशन महबूबा* *आपका हाथ थामकर कहती हैं—* *“डरो मत, हीरो…* *मैं यहाँ हूँ,...

आदिवासी संस्कृति का संरक्षण

 *🙏सच कड़वा लगता है, लेकिन सच को स्वीकार करना ही समझदारी है। यह बात हम सब पर लागू होती है। 🙏* *👉 हमारे समाज के लिए जो निर्णय अदालत से आया है, वह हमें आईना दिखाने वाला है। यदि कोई आदिवासी होकर भी अपने समाज की रीति-रिवाज और परंपराओं को छोड़कर हिन्दू परंपराओं के अनुसार जीवन जीता है, तो उस पर उसी कानून की प्रक्रिया लागू होगी। इसमें अदालत से ज्यादा कहीं न कहीं हम पढ़े-लिखे लोग ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि बदलाव का बीज हमने ही बोया है।* *👉यदि हम चाहते हैं कि हमारी पहचान, हमारी संस्कृति और हमारी परंपराएं सुरक्षित रहें, तो केवल बातें करने से नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में जीने से बचाया जा सकता है।* *👉 अगर परंपरा बचानी है, तो विवाह संस्कार में शुरू से लेकर अंत तक शामिल होना होगा। आजकल हम केवल दावत के दिन पहुंचते हैं, जो हमारी परंपरा के साथ न्याय नहीं है।* *👉 अगर परंपरा बचानी है, तो जन्म संस्कार में भी सक्रिय भागीदारी निभानी होगी। केवल औपचारिकता निभाने से परंपराएं जीवित नहीं रहतीं।* *👉 अगर परंपरा बचानी है, तो मृत्यु संस्कार में भी पूरी संवेदना और जिम्मेदारी के साथ शामिल होना होगा। यह भ...

अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस

  अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस आज है नारियों का दिवस, हर्ष, उमंग के साथ है मानना। उनके हक और अधिकार में, समानता का है भाव लाना। सृष्टि के सभी नारी शक्ति को, सर्वोच्च न्याय अधिकार है देना। शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय नीति में, समर्पण का भाव है देना।  जग के भविष्य को लेकर, चिंता मुक्त है बनाना। उच्च नीच का भाव त्याग कर, उनके हक अधिकार दिलाना।               ।। उपरोक्त स्वरचित काव्य लेख समस्त नारियों के चरणों में समर्पित है, जय हिन्द💐🙏🙏🙏

Ayurvedic Water Therapy

 Ayurvedic Water Therapy - सिर्फ सही पानी पीकर भी तीनों दोष संतुलित किए जा सकते हैं - इस पोस्ट में हम एक बेहद आसान लेकिन अक्सर नजरअंदाज किए जाने वाले विषय पर बात करेंगे — पानी।  आयुर्वेद के अनुसार सही तरीके से पानी पीना अपने-आप में एक चिकित्सा है।  अगर पानी को शरीर की प्रकृति और बीमारी के अनुसार लिया जाए, तो यह वात, पित्त और कफ तीनों दोषों को संतुलित करने में मदद कर सकता है। अक्सर लोग सोचते हैं कि ज्यादा पानी पीना ही हेल्दी है, लेकिन आयुर्वेद कहता है कि सही तापमान, सही समय और सही मात्रा में लिया गया पानी ही शरीर के लिए औषधि बनता है। अब समझते हैं कि गर्म पानी और सामान्य तापमान वाले पानी का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है और किस स्थिति में कौन सा पानी बेहतर रहता है। गर्म पानी के सेवन के प्रमुख लाभ आयुर्वेदिक ग्रंथों में उष्ण जल यानी गर्म पानी को पाचन और शोधन के लिए अत्यंत उपयोगी बताया गया है। पाचन शक्ति को मजबूत करता है गर्म पानी जठराग्नि को सक्रिय करता है। जिन लोगों को भूख कम लगती है, खाना भारी लगता है या भोजन ठीक से नहीं पचता, उनके लिए गर्म पानी बहुत लाभकारी माना जाता है। यह...

पीढ़ी कहां जा रही है एक विचार

👉🏻 *बच्चों की शादी 20 वर्ष की उम्र में तो एक शताब्दी में 5 पीढ़ी* 👉🏻 *बच्चों की शादी 25 वर्ष की उम्र में तो एक शताब्दी में 4 पीढ़ी* 👉🏻 *बच्चों की शादी 33 वर्ष की उम्र में तो एक शताब्दी में 3 पीढ़ी*  साधारण गणना से पता चलता है कि हिन्दू जनसंख्या वृद्धि दर कहां जा रही है? विचारणीय तथ्य। *❗क्या हमारा समाज अगली सदी तक रहेगा ही नहीं?*  — हिन्दू समाज के आत्ममंथन का समय आ गया है — आज चारों ओर एक अजीब-सा अंधकार फैल गया है। 🏚️ गाँव सूने, मोहल्ले खाली, और घरों में चुप्पी है। *बेटियाँ 30–35 की उम्र तक कुंवारी।* *बेटे 35 पार कर चुके, पर विवाह नहीं।* शादी होती है तो बहुत देर से… बच्चे होते हैं तो एक ही… *और फिर तलाक़… टूटे हुए परिवार…* *माता-पिता अकेले…..और पूरी पीढ़ी खोखली।* *क्या इसे “शिक्षित समाज” कहा जाए या “आत्मघाती समाज”?*  *⚠️ जनसंख्या घटने की चुपचाप चलती साजिश*  मान लीजिए 100 लोग हैं = 50 जोड़े। अगर हर जोड़ा केवल एक संतान पैदा करता है — तो अगली पीढ़ी में बस 45-46 बचते हैं। फिर वही क्रम चला, तो तीसरी पीढ़ी में समाज लगभग शून्य। यह कोई डराने की बात नहीं — यह गणित है, ...