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 मेरी उम्र 48 वर्ष है। मैं एक पैथोलॉजिस्ट हूं। पिछले 23 वर्षों से मृत लोगों के पोस्टमार्टम करता आ रहा हूं। तीन महीने पहले मैंने अपनी मां का पोस्टमार्टम किया। अपने हाथों से। यह सुनने में भयानक लगता है। मैं जानता हूं। लेकिन मुझे आपको बताना होगा कि मुझे उनके शरीर के अंदर क्या मिला। क्योंकि यह आपकी जान बचा सकता है। या आपकी मां की। आपके पिता की। आपके पति की। मेरी मां की उम्र 74 वर्ष थी। अपने जीवन के आखिरी तीन वर्षों में वह धीरे-धीरे बुझती चली गईं। चुपचाप। हवा में रखे दीये की तरह। सब कुछ थकान से शुरू हुआ। बहुत भारी और पूरी तरह तोड़ देने वाली थकान। सुबह उठते समय वह इतनी थकी होती थीं, जैसे पूरी रात सोई ही न हों। फिर पेट फूलना शुरू हुआ। वह बहुत कम खाती थीं, लेकिन उनका पेट हमेशा फूला रहता था। इसके बाद उनका वजन कम होने लगा। चेहरा भूरा और बेजान हो गया। त्वचा सूख गई। आंखों के नीचे गहरे काले घेरे दिखाई देने लगे। मैं हर दिन मृत लोगों के साथ काम करता हूं। फिर भी अपनी मां के जीवित रहते हुए मैं यह नहीं समझ पाया कि उनके साथ क्या हो रहा था। मैंने सोचा कि यह उम्र का असर है। वह 74 वर्ष की थीं। मैं और क्...

छुट्टी का अर्थ केवल कार्यालय बंद होना नहीं है

छुट्टी का अर्थ केवल कार्यालय बंद होना नहीं है शासन द्वारा कर्मचारियों को विभिन्न पर्वों एवं अवसरों पर अवकाश प्रदान किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल कार्यालयों को बंद रखना नहीं, बल्कि कर्मचारियों को अपने परिवार, बच्चों, माता-पिता और सामाजिक जीवन के लिए समय देना तथा मानसिक एवं शारीरिक विश्राम प्रदान करना भी है। परंतु वर्तमान में एक नई कार्यसंस्कृति विकसित होती दिखाई दे रही है। रविवार, सार्वजनिक अवकाश अथवा किसी बड़े त्योहार के ठीक पहले या बाद में समीक्षा बैठकें निर्धारित कर दी जाती हैं। कभी जनप्रतिनिधियों की बैठक, कभी प्रभारी मंत्री की समीक्षा, कभी विभागीय मंत्री, सचिव, विभागाध्यक्ष अथवा अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की बैठक—और प्रत्येक बैठक के लिए अलग-अलग प्रारूप में जानकारी एवं प्रस्तुतिकरण तैयार करने का दबाव अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर आता है। ऐसे में प्रश्न यह है कि कर्मचारी बैठक की तैयारी करे या अपना वास्तविक शासकीय कार्य करे? यदि बैठक सोमवार को है तो रविवार तैयारी में निकल जाता है। त्योहार के अगले दिन समीक्षा है तो त्योहार का दिन आंकड़े, पत्रक और प्रस्तुतिकरण बनाने में बीतता है। ...

*एक विनम्र प्रार्थना*

 प्रिय मित्रों,  *एक विनम्र प्रार्थना* ईश्वर की असीम कृपा है कि आज हम एक सुरक्षित सोसाइटी में रहते हैं। हमारे घरों में पर्याप्त राशन है, स्टोर से सामान भी आ रहा है, और सच कहें तो शायद हममें से किसी को कल की भूख का कोई डर भी नहीं है। लेकिन ज़रा एक पल के लिए अपनी बालकनी से बाहर झाँककर या अपनी भरी हुई थाली से नज़रें हटाकर सोचिए क्या हमारे आस-पास की दुनिया में हर घर की कहानी यही है? इसीलिए, अपने इस बड़े परिवार (सोसाइटी) के सभी सदस्यों से मेरी एक हृदयस्पर्शी गुज़ारिश है *👉 सादगी अपनाएं:* अगर आपकी थाली में रोज़ 2 सब्ज़ियाँ सजती हैं, तो कृपया कुछ दिन 1 से ही संतोष कर लें। *👉 संसाधन बचाएं:* जितनी ज़रूरत हो बस उतना ही पकाएं। *👉 अन्न का सम्मान करें:* भूल से कुछ बच भी जाए, तो उसे प्रसाद समझकर अगले पहर ग्रहण कर लें, कूड़ेदान में अन्न का एक दाना भी न जाने दें। हमारी जेबें और साधन शायद हमें महीनों का राशन जमा करने की अनुमति दे दें, लेकिन बाज़ार में संसाधन सीमित हैं। हमारी 'अतिरिक्त चाहत' या 'होर्डिंग (जमाखोरी)' किसी और की 'आखिरी उम्मीद' को छीन सकती है। एक और महत्वपूर्ण बात...

WAMIS PORTAL CHHATTISGARH

  छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग (PWD) में निर्माण कार्यों की पारदर्शिता और गति बढ़ाने के लिए विष्णु देव साय कैबिनेट ने अगस्त 2026 में ही 'वमिस' (WAMIS - Works and Accounts Management Information System) डिजिटल सिस्टम के प्रथम चरण को मंजूरी दी है । इसे C-DAC पुणे द्वारा विकसित किया गया है। [1] चूंकि यह छत्तीसगढ़ में एक नया और हाल ही में स्वीकृत सिस्टम है, इसके सुचारू रूप से लागू होने और पूर्ण पोर्टल पंजीकरण प्रक्रिया शुरू होने से जुड़े महत्वपूर्ण बिंदु निम्नलिखित हैं: छत्तीसगढ़ वमिस (WAMIS) के मुख्य तथ्य एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म : इस सिंगल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कार्यों के e-Estimation (प्राकलन), e-Procurement (निविदा), e-Measurement Book (ई-माप पुस्तिका) और सीधे ऑनलाइन बिल भुगतान (Bill Payments) प्रबंधित किए जाएंगे। [1] चरणबद्ध शुरुआत : यह प्रणाली सबसे पहले छत्तीसगढ़ लोक निर्माण विभाग (PWD) में लागू की जा रही है और इसके बाद इसे अन्य निर्माण विभागों में भी विस्तारित किया जाएगा। [1] रियल-टाइम मॉनिटरिंग : कार्यों के डीपीआर (DPR) तैयार करने से लेकर प्रशासनिक स्वीकृति और गुणवत्ता...

इथेनॉल

 इथेनॉल कई लोग कह रहे हैं कि गन्ने से इथेनॉल बन रहा है इसलिए चीनी महंगी हो रही है. वास्तव में इन लोगों को यह भी नहीं पता है कि चीनी कैसे बनती है और इथेनॉल कैसे बनता है. इनको यह भी नहीं पता की अगर आज इथेनॉल नहीं बिक रहा होता तो चीनी सौ में भी नहीं मिलती.  वास्तविकता यह है कि गन्ने से मुख्य रूप से चीनी बनाइ जाती है. चीनी बनाने के बाद गन्ने का बेगास (खोई) निकलती है, यह बायलर में जलाने के काम आती है इसके अलावा इससे पेपर और पार्टिकल बोर्ड (एक तरह का प्लाई वूड जिससे स्पीकर बॉक्स बनते हैं) बनाया जाता है  लगभग दस किलोग्राम गन्ने से एक किलोग्राम चीनी बनती है. बाकी सब बेगास, शीरा और मैली बन जाता है. मैली से जैविक खाद बनाई जाती है. शीरे से जो इथेनॉल बनता है उससे पहले केवल शराब और स्पिरिट (इथेनॉल में कॉपर सल्फेट का मिश्रण) बनती थी.  शराब और स्परिट की खपत बहुत कम है इसलिए पहले बड़े बड़े खड्डों में शीरा डाल दिया जाता था या फिर नालों में वह दिया जाता था. जबसे इथेनॉल को पेट्रोल में मिक्स किया जाने लगा है, तब से शीरे को फेंकना बंद हो गया है और इससे शुगर मिल को अतिरिक्त आमदनी होती है....

आजादी के 80 दशक

 आजादी के 80 दशक बाद भी आदिवासी गुलाम है न उनकी भाषा बची,न जमीन बचा ,न संस्कृति बची ,न देव बचा ,न देवालय ,शिक्षा बची,न पुरखों का इतिहास बचा बचा है तो लाचारी जिनको न सत्ता सुनती है न ही सरकार,न प्रशासन न पुलिस हर तरफ से आदिवासी हाशिए पर है जहां सिर्फ कटना उनको है .. आखिर 80 दशक बाद इतने संविधान में अधिकार है फिर लाचारी वो जमीन पर कही नहीं बचा आज आदिवासियों के नाम पर भारत में सबसे ज्यादा संगठन पर सभी सूटकेश के लिए और आरक्षित नेता कुत्ता से बत्तर हो गया है न बोलता है न सुनता है मै कैसे आजादी मनाऊं जब मेरे समाज को नक्सली देशद्रोही विकास बाधक इस देश की सत्ता कहती है मै युवा पीढ़ी से अनुरोध करता हु जागो और भावनात्मक राजनीति समाज नीति से बाहर आओ समाज को इस दलदल से निकालना आपकी जिम्मेदारी है.. आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर आदिवासी समाज का सबसे बड़ा सवाल: आखिर यह कैसी आज़ादी है? “आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी अगर किसी समाज को अपनी जमीन, जंगल, भाषा, संस्कृति, देवस्थल, शिक्षा, सम्मान और अपने भविष्य के लिए लगातार लड़ना पड़े, तो सवाल सिर्फ उस समाज से नहीं—पूरी व्यवस्था से पूछा जाना च...

क्या कोई जन्म से जनजाति होता है?

 ✍️क्या कोई जन्म से जनजाति होता है? ✍️अगर कोई जन्म से जनजाति है, तो किसके जन्म से, खुद के जन्म से, बाप के जन्म से, दादा के जन्म से? किसके जन्म से वो जनजाति है?  ✍️अगर दादा का जन्म 1947 से पहले या यूँ कहें की संविधान की स्वीकारोक्ति 1950 से पहले हुआ है तो क्या वो जनजाति था. ✍️मान लीजिये आपके दादा का जन्म 1920 में हुआ था क्या वो जनजाति था और उसी के आधार पर आप अपने आप को जनजाति कहते हो। या आपके समुदाय को 1950 में पहली बार अनुसूचित जनजाति के रूप में पहचाना गया, उसके बाद यह जनजाति हुआ है।  ✍️1950 में आपके पूर्वजों और उनके समुदाय को किस आधार पर जनजाति के रूप में पहचाना गया?  ✍️1. संवैधानिक परिभाषा (अनुच्छेद 342): भारत के राष्ट्रपति को, हर राज्य के राज्यपाल से सलाह करके, उन जनजातियों या जनजातीय समुदायों को निर्दिष्ट करने की शक्ति दी गई थी जिन्हें अनुसूचित जनजाति (ST)  माना जाएगा।  लेकिन निर्दिष्ट करेंगे कैसे?  आधार बनाया गया अगले 2 और 3 नंबरों को.   ✍️2. 1950 के संविधान में जनजाति की कोई सख्त, एक जैसी और वैज्ञानिक परिभाषा नहीं दी गई थी. इसके बजाय, ज...