संदेश

आजादी के 80 दशक

 आजादी के 80 दशक बाद भी आदिवासी गुलाम है न उनकी भाषा बची,न जमीन बचा ,न संस्कृति बची ,न देव बचा ,न देवालय ,शिक्षा बची,न पुरखों का इतिहास बचा बचा है तो लाचारी जिनको न सत्ता सुनती है न ही सरकार,न प्रशासन न पुलिस हर तरफ से आदिवासी हाशिए पर है जहां सिर्फ कटना उनको है .. आखिर 80 दशक बाद इतने संविधान में अधिकार है फिर लाचारी वो जमीन पर कही नहीं बचा आज आदिवासियों के नाम पर भारत में सबसे ज्यादा संगठन पर सभी सूटकेश के लिए और आरक्षित नेता कुत्ता से बत्तर हो गया है न बोलता है न सुनता है मै कैसे आजादी मनाऊं जब मेरे समाज को नक्सली देशद्रोही विकास बाधक इस देश की सत्ता कहती है मै युवा पीढ़ी से अनुरोध करता हु जागो और भावनात्मक राजनीति समाज नीति से बाहर आओ समाज को इस दलदल से निकालना आपकी जिम्मेदारी है.. आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर आदिवासी समाज का सबसे बड़ा सवाल: आखिर यह कैसी आज़ादी है? “आजादी के 80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी अगर किसी समाज को अपनी जमीन, जंगल, भाषा, संस्कृति, देवस्थल, शिक्षा, सम्मान और अपने भविष्य के लिए लगातार लड़ना पड़े, तो सवाल सिर्फ उस समाज से नहीं—पूरी व्यवस्था से पूछा जाना च...

क्या कोई जन्म से जनजाति होता है?

 ✍️क्या कोई जन्म से जनजाति होता है? ✍️अगर कोई जन्म से जनजाति है, तो किसके जन्म से, खुद के जन्म से, बाप के जन्म से, दादा के जन्म से? किसके जन्म से वो जनजाति है?  ✍️अगर दादा का जन्म 1947 से पहले या यूँ कहें की संविधान की स्वीकारोक्ति 1950 से पहले हुआ है तो क्या वो जनजाति था. ✍️मान लीजिये आपके दादा का जन्म 1920 में हुआ था क्या वो जनजाति था और उसी के आधार पर आप अपने आप को जनजाति कहते हो। या आपके समुदाय को 1950 में पहली बार अनुसूचित जनजाति के रूप में पहचाना गया, उसके बाद यह जनजाति हुआ है।  ✍️1950 में आपके पूर्वजों और उनके समुदाय को किस आधार पर जनजाति के रूप में पहचाना गया?  ✍️1. संवैधानिक परिभाषा (अनुच्छेद 342): भारत के राष्ट्रपति को, हर राज्य के राज्यपाल से सलाह करके, उन जनजातियों या जनजातीय समुदायों को निर्दिष्ट करने की शक्ति दी गई थी जिन्हें अनुसूचित जनजाति (ST)  माना जाएगा।  लेकिन निर्दिष्ट करेंगे कैसे?  आधार बनाया गया अगले 2 और 3 नंबरों को.   ✍️2. 1950 के संविधान में जनजाति की कोई सख्त, एक जैसी और वैज्ञानिक परिभाषा नहीं दी गई थी. इसके बजाय, ज...

स्वतंत्रता आंदोलन, जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम

 *स्वतंत्रता आंदोलन, जल, जंगल, जमीन का महासंग्राम: राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्र निर्माण में आदिवासियों का अप्रतिम योगदान और बलिदान* भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1757 से 1947 तक का इतिहास आदिवासी क्रांतिकारियों के अद्वितीय बलिदान, शौर्य,स्वतंत्रता आंदोलन और 'जल, जंगल, जमीन' की रक्षा के लिए किए गए संघर्षों से भरा हुआ है, जब देश के बड़े-बड़े राजा-महाराजा अंग्रेजों के सामने घुटने टेक रहे थे, तब देश के आदिवासी वीरों ने पारंपरिक हथियारों के बल पर ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। आदिवासी समाज आदिकाल से ही जल, जंगल और जमीन का संरक्षक रहा है। उनका संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता के लिए नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक स्वायत्तता,सामाजिक ताने-बाने और आध्यात्मिक पहचान को बचाने का था। आदिवासियों के लिए प्रकृति कोई उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि उनका देवत्व है। जब ब्रिटिश साम्राज्य ने उनकी इस पावन धरती पर कदम रखा और उनकी संप्रभुता को चुनौती दी, तो आदिवासियों की आध्यात्मिक चेतना और मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम ने एक ऐसी क्रांति को जन्म दिया।जिसे अंग्रेजी साम्राज्य के जड़ो को हिला दिया। *स्वतंत्रता सं...

🌿 *9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर संदेश* 🌿

 *सर्व आदिवासी समाज बस्तर संभाग, जगदलपुर का विश्व आदिवासी मूलनिवासी दिवस के पूर्व संध्या समाज के नाम संदेश* 🌿 *9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर संदेश* 🌿 बस्तर के मूलनिवासी एवं आदिवासी समाज के नाम जोहार बस्तर! सेवा जोहार! जोहार आदिवासी समाज! बस्तर की धरती केवल मिट्टी का भू-भाग नहीं है। यह हमारे पूर्वजों की स्मृतियों, संघर्षों, संस्कृति, परंपराओं, भाषा, प्रकृति और सामुदायिक जीवन की जीवंत पहचान है। 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस हमारे लिए केवल बधाई और उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व, अस्मिता, अधिकार और भविष्य पर विचार करने का ऐतिहासिक अवसर है। आज आवश्यकता है कि हम स्वयं से सवाल करें— क्या हम अपने अधिकारों को जानते हैं? क्या हमारी ग्रामसभाएँ अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हैं? क्या हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास को समझ रही है? और क्या हम अपने जल, जंगल, जमीन तथा सामुदायिक संसाधनों की रक्षा के लिए एकजुट हैं? संविधान ने हमें केवल अधिकार नहीं दिए, जिम्मेदारी भी दी है। बस्तर के अनुसूचित क्षेत्रों में पाँचवीं अनुसूची, पेसा कानून और ग्रामसभा की संवैधानिक ...

*पुरखों की विरासत बनाम बाहरी हस्तक्षेप*

 *पुरखों की विरासत बनाम बाहरी हस्तक्षेप*  हमारी संस्कृति, बोली-भाषा, परब-पंडुम, पहनावा एवं रूढ़ि-नेंग ही हमारी वास्तविक पहचान हैं। कोया जब गर्भ में होता है, तभी से उसे प्रकृति की रक्षा और प्राकृतिक शिक्षा का ज्ञान मिलने लगता है। आज बुजुर्गों से दूरी के कारण युवा अवश्य भटक रहे हैं, किंतु उनकी अस्मिता उनके अनादिकालीन परंपरा और संस्कृति में ही निहित है। हमारे पूर्वजों ने जल-जंगल-जमीन की रक्षा तथा अपनी संस्कृति में बाह्य हस्तक्षेप के विरुद्ध संघर्ष किया है, जिसके ऐतिहासिक प्रमाण आज भी उपलब्ध हैं; जैसे — संथाल विद्रोह (1855-56), मुंडा उलगुलान (1899-1900), हल्बा डोंगर आंदोलन (1774-1779), कोया विद्रोह, भील और कोल आंदोलन। यदि इन आंदोलनों की पृष्ठभूमि को खंगाला जाए, तो स्पष्ट होगा कि हमारे पूर्वज सदैव बाहरी हस्तक्षेप के विरोध में खड़े रहे। हमारे पुरखों को भली-भांति ज्ञात था कि हमारी संस्कृति, परब-पंडुम एवं नेंग-जोग में हस्तक्षेप कर हमें अपने जाल में फँसाने का प्रयास किया जाएगा। उन्हें यह भी स्पष्ट था कि हमारी परंपराओं को अपने ग्रंथों के समान बताकर मितव्यवहार के माध्यम से हमारे निकट आया...

ST SC। पर धर्म परिवर्तन का असर

 यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय है, जिसे स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है। आपकी इमेज में जो दावा किया गया है, वह पूरी तरह सही नहीं है क्योंकि यह अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के बीच के एक बड़े कानूनी अंतर को नजरअंदाज करता है। भारतीय कानून के अनुसार स्थिति इस प्रकार है: 1. अनुसूचित जाति (SC) के लिए नियम अनुसूचित जाति के मामले में यह पोस्ट आंशिक रूप से सही है। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार, केवल वही व्यक्ति SC का दर्जा प्राप्त कर सकता है जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को मानता हो। यदि कोई SC सदस्य ईसाई या इस्लाम धर्म अपनाता है, तो वह अपना SC दर्जा और उससे मिलने वाला आरक्षण खो देता है। सुप्रीम कोर्ट में अभी भी इस पर विचार चल रहा है कि क्या दलित ईसाइयों और मुस्लिमों को भी SC का दर्जा मिलना चाहिए, लेकिन फिलहाल कानून वही है जो ऊपर बताया गया है। 2. अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए नियम (आपका मुख्य क्षेत्र) इमेज में किया गया दावा अनुसूचित जनजाति (ST) पर लागू नहीं होता। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। ST का दर्जा धर्म पर आधारित नहीं है, बल्कि यह 'जातीय पहचान' और ...

**पेनकड़ा के आवश्यक दिशा~निर्देश /चेतावनी**

 **पेनकड़ा के आवश्यक दिशा~निर्देश /चेतावनी** —""लिंगो पेनकड़ा वल्लेकनार्र में आपका हार्दिक स्वागत/सेवा~जोहार"":—🙏🙏🙏 बुमकाल कृपया ध्यान रहे......! १-जूता-चप्पल,बेल्ट,फुलपैंट,पायजामा वर्जित है।आप धोती-लुहंगी पहनकर ही पेनकड़ा/जतरा के निर्धारित परिधि में प्रवेश कर सकते हैं। २-कैमरा -मोबाईल से फोटोग्राफी-वीडियो ग्राफी प्रतिबंधित है। कार्यालय दस्तावेजीकरण के रुप में केवल अधिकृत व्यक्ति ही करेंगे। ३- पेन बानाओं में अगरबत्ती/सिंदुर/चुनरी चढ़ाना भी प्रतिबंधित है। कृपया प्रतिबंधित सामाग्रियों को लेकर न जायें।अगरबत्ती के स्थान पर धूप/नीबू/लाली का ही उपयोग करेंगे। ४-किसी भी पेन बानाओं को छूना सक्त मना है । कृपया निर्धारित दूरी से ही पेनों का दर्शन करेंगे। ५-यू-ट्युबरों,रील्स बनाने वालों को भी निर्देश है कि  समिति द्वारा अधिकृत व्यक्ति के बिना लिंगो पेन से संबंधित आडियो- विडियो क्लिप्स शेयर नहीं करेंगे और न ही जप लिंगो पेन या पेन बानाओं के संबंध में कोई भी सगाजन उल्टी-सीधी जानकारी नहीं देंगे। ६-पेनकड़ा ""नो पाॅलिथीन जोन""  घोषित है।डिस्पोजल गिलास,डिस्पोजल प्ल...